Wednesday, 16 August 2017

बॉब डिलेन (Bob Dylen), गीतों की दुनिया और साहित्य का नोबेल

मुझे लगता है कि जाने-माने अमेरिकी गीतकार और गायक Bob Dylan को लिटरेचर का नोबेल मिलना साहित्य जगत में एक नए बदलाव की आहट है। उम्मीद है, इससे हिन्दी और भारतीय भाषाओं का अकादमिक साहित्य जगत थोड़ा उदार होगा और लोकप्रिय साहित्य-संगीत को 'साहित्य' के रूप में स्वीकारना शुरू करेगा।

अकादमिक जगत के कुछ (सब नहीं, अतः कृपया दिल पर लें) मठाधीश टाइप के लोग लोकप्रिय गीतकारों और लोक कवियों को 'साहित्यकार' की श्रेणी में नहीं गिनते। हिन्दी साहित्य जगत में तो स्थिति और भी ख़राब है।ऐसी कविताजो एक सुशिक्षित व्यक्ति के भी पल्ले पड़े, सिर्फ़ उसे ही साहित्य मानने की जिद और आम बोल-चाल की भाषा में रचे गए लयबद्ध गीतों और कविताओं को दोयम दर्जे का साहित्य मानना कहाँ तक तर्कसंगत है, उम्मीद है, कुछ विद्वान ही इस पर प्रकाश डालेंगे। 
भूलना नहीं चाहिए कि साहित्य की तीन मूल विधाएँ -गीत, कहानी और नाटक, सभ्यता की शुरुआत से ही लोक-जीवन में रचे बसे हैं और अपनी लोक भाषा, लय और नाद सौंदर्य के बल पर आम जन की ज़ुबान पर चढ़ते रहे हैं। कबीर से लेकर निराला तक, कविता की तुकांतता ने निरंतर उसके नाद सौंदर्य के माध्यम से साहित्य को जन-जन तक पहुँचाया है।

हमें उम्मीद करनी चाहिए कि हिन्दी वाले अकादमिक लोग भी अब पुनर्विचार करते हुए गुलज़ार साहब, गोपालदास नीरज, दुष्यंत कुमार, अदम गोंडवी, प्रसून जोशी, इरशाद कामिल, स्वानन्द किरकिरे जैसे बेहतरीन गीतकारों के लोकप्रिय गीतों के लिटरेरी योगदान को कुछ तवज्जो देंगे।

Monday, 26 June 2017

क्या पढ़ रहे हैं आजकल?

क्या पढ़ रहे हैं आजकल?



मैंने अपने एक दोस्त एक शाम जब ये सवाल यूँ ही पूछा, तो उसने मुझे एनसीईआरटी और योजना से लेकर इंडिया ईयरबुक और लक्ष्मीकान्त तक न जाने कितने नाम गिना दिए; मैंने हल्की सी मुस्कान के साथ उससे दोबारा पूछा, कि टेक्स्ट बुक्स और परीक्षा केंद्रित सामग्री के अलावा क्या पढ़ रहे हो आजकल?

मेरा ये सवाल सुनकर वह चौंका और मुझे ध्यान से देखने लगा, जैसे मैंने कोई अवांछित या अनपेक्षित सी बात पूछ ली हो। होना क्या था, फिर वह शाम काफ़ी विचारोत्तेजक और दिलचस्प गुज़री। उस शाम की बातचीत की कुछ ज़रूरी और काम की बातें आपसे साझा कर रहा हूँ।

हममें से ज़्यादातर लोग सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के दौरान बेहद सीमित और संकीर्ण सा रवैया अपनाने के हिमायती होते हैं। कुछ निर्धारित टेक्स्ट बुक और चुनिंदा पत्र-पत्रिकाएँ पढ़ना एकदम पर्याप्त है और इसके अलावा अगर हम कुछ भी रोचक-मनोरंजक फ़िक्शन या नॉन-फ़िक्शन या कोई और मैगज़ीन और अपनी रूचि से जुड़ा साहित्य पढ़ रहे हैं, तो यह सिविल सेवा परीक्षा की गम्भीर तैयारी के साथ अन्याय जैसा है, ऐसा हममें से अधिकतर लोग सोचते हैं।

हालाँकि इसमें कोई संदेह नहीं, कि तैयारी सिविल सेवा परीक्षा की हो या अन्य किसी परीक्षा की, तैयारी फ़ोकस्ड और केंद्रित होनी ही चाहिए, ताकि बेहतर आउटपुट आ सके, पर मैं साथ ही यह भी जोड़ना चाहूँगा कि नए पैटर्न और ट्रेंड को देखते हुए रीडिंग हैबिट एक अनिवार्य ज़रूरत बनकर उभरी है। आइए समझते हैं क्यों और कैसे?

आपने सिविल सेवा परीक्षा के हाल ही के प्रश्नपत्रों में महसूस किया कि पूछे जाने वाले सवालों का दायरा पहले से ज़्यादा व्यापक ही हुआ है और यह अंदाज़ा लगाना सचमुच मुश्किल है, कि सवालों के स्त्रोत कितने विविध और बिखरे हुए हो सकते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि हमारी तैयारी का दायरा भी ठीक-ठाक व्यापक होना चाहिए, जिसमें हम अपनी आँख-कान खुले रखकर नयी चीज़ों को लगातार सीखते रहें। इस तरह अपने लेखन कौशल को निखारने के लिए प्रमुख तौर पर दो चीज़ों की दरकार होती है, एक तो अच्छी स्तरीय सामग्री (content) और दूसरा भाषा पर अधिकार, जिसमें हमारी शब्दावली (vocabulary) और शैली (style) महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। रीडिंग हैबिट यानी पढ़ने की आदत या पढ़ने का शौक़, इन दोनों ज़रूरतों को पूरा करके लेखन कौशल को निखारने में ज़बरदस्त मदद करता है। टेक्स्ट बुक से अलग कुछ और पढ़ते-पढ़ते न केवल नयी जानकारियों और ज्ञान से रु-ब-रु होने का मौक़ा मिलता है, बल्कि भाषा पर पकड़ भी मज़बूत होती है। साथ ही एक बेहतरीन आदत का विकास होता और आनंद की अनुभूति होती है, सो अलग।
पढ़ना भी बाक़ी रूचियों (hobbies) की तरह एक शानदार और दिलचस्प हॉबी है। लेकिन सवाल है कि इस तरह की शौक़िया रीडिंग कब करें और पढ़ें तो क्या पढ़ें?
पहली बात का जवाब तो यह है कि जब टेक्स्ट बुक पढ़ते-पढ़ते ऊब जाएँ, या फ़ुर्सत में हों, या ट्रैवल कर रहे हों, तो यूँ ही कोई भी किताब या मैगज़ीन, जो आपको पसंद हो या आपको आकर्षित करे, उसे पढ़ने का वक़्त निकालें।
लेकिन हिंदी में क्या पढ़ें, यह सवाल काफ़ी प्रासंगिक और ज्वलंत सा हो जाता है। मैं इस सवाल का जवाब खोजने में आपकी मदद करने की कोशिश करता हूँ।
ऐसी किताबों को आप सुविधा और रूचि के अनुसार तीन-चार कैटेगरी में बाँट सकते हैं:-
पहली श्रेणी में वे किताबें आती हैं, जो सीधे-सीधे परीक्षा के पाठ्यक्रम से जुड़ी नहीं हैं, पर उन्हें पढ़कर सामान्य अध्ययन या विषय पर अपनी पकड़ मज़बूत की जा सकती है और सोच का दायरा बढ़ाने व चिंतन की गहराई बढ़ाने में मदद मिलती है। ये किताबें, इतिहास, राजनीति, शासन, अंतरराष्ट्रीय सम्बंध, अर्थशास्त्र, समाज, नीति और दर्शन पर सामान्य रीडर्स की रूचि के हिसाब से लिखी जाती हैं और आपकी समझ को गहरा और व्यापक बनाती हैं। इन किताबों में अमर्त्य सेन, रामचंद्र गुहा, गुरचरन दास, ज़्याँ द्रेजे, रजनी कोठारी, शशि थरूर, राम आहूजा, श्यामाचरण दुबे, प्रताप भानु मेहता, बिपिन चंद्रा, सुनील खिलनानी आदि लेखकों की किताबें शामिल हो सकती हैं।
इनमें से ज़्यादातर किताबों के बेहतरीन हिंदी अनुवाद आजकल बाज़ार और अमेजन वेबसाइट पर उपलब्ध हैं। इस तरह की ज्ञानवर्धक और प्रामाणिक किताबों के लिए भारत सरकार के नेशनल बुक ट्रस्ट और प्रकाशन विभाग की किताबें भी बेहतर विकल्प हैं।

दूसरी तरह की किताबें हैं सदाबहार रोचक साहित्यिक किताबें जैसे-  प्रेमचंद, जैनेंद्र कुमार, चन्द्रधर शर्मा गुलेरी, मोहन राकेश, धर्मवीर भारती, फणीश्वरनाथ रेणु, श्रीलाल शुक्ल, अमरकान्त, हरिशंकर परसाई, शरद जोशी काशीनाथ सिंह, उदय प्रकाश, चित्रा मुद्गल, मैत्रेयी पुष्पा आदि के उपन्यास, कहानियाँ, नाटक और व्यंग्य। यह क्लासिक साहित्य आपको विविध तरह के समाजों के सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक जीवन और समस्याओं को समझने में मदद करके संवेदनशील बनाता है और भाषाई कौशलों का विकास होता है सो अलग। अगर आप कविताओं में दिलचस्पी रखते हैं, तो निराला, प्रसाद, महादेवी, पंत, दिनकर, मुक्तिबोध, अज्ञेय, नागार्जुन, राजेश जोशी की कविताओं से लेकर दुष्यंत कुमार, निदा फ़ाज़ली, जावेद अख़्तर और गुलज़ार की ग़ज़लें आपका इंतज़ार कर रही हैं। हिंदी और उसकी सभी बोलियों-उपभाषाओं के बेहतरीन साहित्य को इंटरनेट पर पढ़ने के लिए आप 'कविता कोश' और 'गद्य कोश' नामक दो बेहतरीन वेबसाइटों का सहारा ले सकते हैं।

तीसरी तरह की किताबें भी शौक़िया क़िस्म की किताबें हैं। ये है युवाओं पर केंद्रित नया और ताज़गी भरा साहित्य, जो 'नई वाली हिंदी' में युवा लेखकों द्वारा लिखा गया है। यह ज़्यादातर कहानियाँ, नॉवल या ट्रेवलोग़ (यात्रा वृतांत) हैं, जिनसे युवा पाठक ख़ुद को जोड़ पाते हैं और इन्हें हाथों-हाथ ले रहे हैं। मिसाल के तौर पर हाल ही में चर्चित नीलोत्पल मृणाल की 'डार्क हॉर्स', दिव्यप्रकाश दुबे की 'मसाला चाय' और 'शर्तें लागू', सत्य व्यास की 'दिल्ली दरबार' और 'बनारस टाक़ीज', पंकज दुबे की 'लूज़र कहीं का', अनुराधा बेनीवाल की 'आज़ादी मेरा ब्राण्ड' जैसी किताबें शामिल हैं। इस तरह के नयी क़िस्म के साहित्य के भीतर इंग्लिश के लोकप्रिय लेखकों; चेतन भगत, अमीश त्रिपाठी, अश्विन सांघी, आनंद नीलकंठन की लोकप्रिय किताबों के हिंदी अनुवाद भी शामिल किए जा सकते हैं।


किताबों के अलावा कुछ अच्छी पत्रिकाएँ भी हैं, जो शौक़िया तौर पर पढ़ी जा सकती हैं। जैसे- हिंदुस्तान टाइम्स समूह की 'कादम्बिनी' और दैनिक भास्कर समूह की 'अहा ज़िंदगी'। नवनीत, नया ज्ञानोदय, आजकल, पाखी आदि भी कुछ ऐसी ही पत्रिकाएँ हैं।

समय-समय पर बुक कल्चर को बढ़ावा देने के लिए पुस्तक मेले और लिट्रेचर फ़ेस्टिवल जैसे आयोजन आजकल काफ़ी होने लगे हैं। इनमें टहलकर किताबों की दुनिया की ताज़गी महसूस की जा सकती है और समकालीन साहित्यिक और सूचनाप्रद व ज्ञानवर्धक किताबों व पत्रिकाओं से रु-ब-रु हुआ जा सकता है।

कुल मिलाकर बात इतनी सी है कि रीडिंग हैबिट या पढ़ने का शौक़ आपकी सोच और समझ को विस्तृत और व्यापक बनाता है, आपको बेहतर एक्सपोज़र देता है और भाषा पर आपका अधिकार मज़बूत तो करता ही है। ऊपर जो कुछ मैंने लिखा है, उससे घबराएँ नहीं। ऊपर लिखी किसी भी किताब को पढ़ना यूपीएससी की परीक्षा को उत्तीर्ण करने के लिए क़तई अनिवार्य नहीं है। इनमें से आप अपनी रूचि और पसंद के मुताबिक़ किताबें चुनकर अपनी एक ज़िंदगी भर चलने वाली शानदार हॉबी विकसित कर सकते हैं, और कदाचित यह भी सम्भव है कि आपकी सिविल सेवा परीक्षा के किसी चरण में इस पढ़ाई के शौक़ का कोई प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष लाभ मिल जाए। तो अब ख़ुद से और अपने दोस्तों से गपशप करते हुए पूछ ही लीजिए- 'क्या पढ़ रहे हैं आजकल?'

-निशान्त जैन 
(लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं)



Thursday, 15 June 2017

तकनीक से क़दमताल करना सीखें...

एक ज़माना था, जब अस्सी के दशक में भारत में टेलीविजन आया, तो खलबली सी मच गयी। लोगों के लिए इस बात पर भरोसा करना मुश्किल था, कि एंटीना से सिग्नल पकड़कर कैसे टीवी स्क्रीन पर चित्रहार या चलचित्र दिख सकता है। यह अविश्वास केवल तकनीक पर ही नहीं था, बल्कि अविश्वास और आशंकाएँ इस नयी तकनीक यानी टीवी के समाज और विशेषकर युवाओं पर दुष्प्रभाव को लेकर भी थीं।
कई लोगों को लगता था कि आने वाली पीढ़ी इस 'बुद्धू बक्से' के आकर्षण में फँसकर बर्बाद हो जाएगी। यही क़िस्सा वर्ष 2000 के बाद के दौर में भारत में मोबाइल फ़ोन के बढ़ते प्रचलन को लेकर भी दोहराया गया। न जाने कितने लोगों को लगता था कि यह हाथ में आने वाला छोटा सा यंत्र तो युवा पीढ़ी को बिगाड़ने में कोई क़सर नहीं छोड़ेगा। हालाँकि आज भी ऐसा विचार रखने वाले लोगों की संख्या ठीक-ठाक है।
मोबाइल और इंटरनेट के प्रसार के साथ सूचना क्रांति और मनोरंजन के नए युग का सूत्रपात भी हुआ। हर सवाल का जवाब 'गूगल' बाबा एक क्लिक पर बताने लगे। विकीपीडिया पर ज्ञान-विज्ञान का अथाह भंडार उपलब्ध हुआ। मुख्यधारा के मीडिया के साथ-साथ तेज़ी से एक नए क़िस्म के मीडिया -'सोशल मीडिया' का भी प्रचलन तेज़ी से बढ़ा, जहाँ अपनी बात साझा करने के लिए सम्पादक जी से अनुरोध करने की भी आवश्यकता नहीं है। समाज के वंचित वर्गों और युवाओं को भी खुलकर अपनी बात रखने का खुला मंच मिला और वाद-विवाद-संवाद के नए अवसर सामने आने लगे। निस्सन्देह इस सबसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पारदर्शिता की संस्कृति को भी ख़ूब बढ़ावा मिला।
टीवी से लेकर मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया तक, संचार और सूचना क्रांति का लम्बा सफ़र तय कर चुके इस युग में क्या हममें से कोई विज्ञान और तकनीकी के इन उपहारों के बग़ैर अपना रोज़मर्रा का जीवन इन साधनों के बग़ैर बिताने की कल्पना भी कर सकता है? वही रूढ़िवादी क़िस्म के लोग, जो अपने-अपने युग में नयी तकनीक के प्रभाव को लेकर आशंकित महसूस करते थे, क्या वही बाद में उस तकनीक के बढ़े उपयोगकर्ता नहीं बने? इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज हम तकनीक के साधनों के बग़ैर एक दिन बिताने की कल्पना नहीं कर सकते।

जब हम रोज़मर्रा के जीवन और सुख-सुविधाओं के उपभोग में विज्ञान-तकनीकी के साधनों का जमकर उपयोग करते हैं, तो ज्ञानार्जन में तकनीकी के उपयोग को लेकर झिझक कैसी। यदि युवाओं द्वारा सिविल सेवा परीक्षा और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के संदर्भ में बात करें, तो अपने नोलेज और लर्निंग के विस्तार और एक्सपोज़र के लिए तकनीकी का महत्व और भी अधिक पढ़ जाता है।

डार्विन के 'योग्यतम की उत्तरजीविता' (Survival of the fittest) के सिद्धांत की तर्ज़ पर हमें समझना होगा कि तेज़ी से बदलती तकनीक के इस दौर में तकनीक से क़दमताल करना वक़्त की माँग है। किसी शायर ने लिखा भी है,
'इस मशीनी दौर में रफ़्तार ही पहचान है,
धीरे-धीरे जो चलोगे, गुमशुदा हो जाओगे।'

यदि सिविल सेवा परीक्षा के विशेष संदर्भ में बात करें, तो हमें समझना होगा इस परीक्षा की प्रकृति डायनमिक और व्यापक है, कि इस परीक्षा की तैयारी के विभिन्न पक्षों को कवर करने के लिए विभिन्न प्रासंगिक स्त्रोतों को फ़ॉलो करना अपरिहार्य हो जाता है। इनमें किताबों और अख़बार-पत्रिका के अलावा टीवी, इंटरनेट, यू ट्यूब आदि का विवेकपूर्ण उपयोग भी शामिल है। आज भारत सरकार की अनेक वेबसाइटें और ढेरों अन्य निजी वेबसाइटें परीक्षा की तैयारी के लिए प्रासंगिक भरपूर प्रामाणिक सामग्री उपलब्ध करा रही हैं। बस शर्त यह है कि जो भी वेबसाइट फ़ॉलो करें, उसकी साख और प्रतिष्ठा भी जाँच लें।
हालाँकि तकनीक की आँधी के इस दौर में, उसके विवेकपूर्ण ढंग से उपयोग से उसे सम्भालना भी उतना ही ज़रूरी है। तकनीक आप का कल सँवार भी सकती है और आपके हाथ जला भी सकती है।
दिनकर ने लिखा भी है-
'सावधान मनुष्य यदि विज्ञान है तलवार,
तो इसे दे फेंक तजकर मोह स्मृति के पार,
खेल सकता तू नहीं, ले हाथ में तलवार,
काट लेगा अंग है तीखी बड़ी यह धार।'

यह भी समझना ज़रूरी है कि तकनीक का अविवेकपूर्ण और अत्यधिक उपयोग घातक भी हो सकता है। सोशल मीडिया का ही उदाहरण लें। एक ओर सोशल मीडिया ने संवाद की संस्कृति को बढ़ावा दिया है, वहीं दूसरी ओर इसकी लत आज के युग की बड़ी मनोवैज्ञानिक समस्या बनकर उभरी है। हमें चैटिंग या सर्फिंग करते वक़्त ये अंदाज़ा ही नहीं रहता कि दिन में कितने घंटे हमने कम्प्यूटर या मोबाइल पर आँखें गड़ाए बिता दिए। फ़ेसबुक और वाट्सएप के अतिशय उपयोग की लत ने ढेरों युवाओं को तनाव और अवसाद की ओर धकेला है।
लिहाज़ा तकनीक से इस्तेमाल को लेकर व्यर्थ ही आशंकित रहने वालों को यह समझना होगा कि तकनीक से क़दमताल करके ही हम नए दौर की रफ़्तार में समांजस्य बैठाकर सर्वाइव कर सकते हैं। पर यह भी ध्यान रहे कि तकनीक की आँधी में बहकर तकनीक का अंधाधुँध उपयोग भी कोई लाभ देने वाला नहीं है। तकनीक पर अत्यधिक निर्भरता एक लत का रूप लेकर नए क़िस्म की समस्याओं को जन्म दे सकती है।

-निशान्त जैन
(लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं)


Tuesday, 25 April 2017

'क्यों अपनाएँ मध्यम मार्ग?'

'क्यों अपनाएँ मध्यम मार्ग?'


क्या कभी हमने यह भी सोचा है कि हम सिविल सेवा परीक्षा या अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में सम्मिलित क्यों होते हैं? क्यों हम दिन-रात एक कर, निरंतर कठिन परिश्रम कर परीक्षा में सफलता के लिए पूरा ज़ोर लगा देते हैं? क्यों हम चौतरफ़ा दबावों और तनावों के बीच तपकर इस कंटक पथ पर चलकर सब कुछ समर्पित कर देते हैं?
यद्यपि सबकी प्राथमिकतायें और उद्देश्य अलग-अलग हो सकते हैं, पर अगर कभी फ़ुर्सत में ठंडे दिमाग़ से इस सवाल का जवाब सोचें, तो मोटे तौर पर कुछ बातें सामने आती हैं, जैसे-
-एक बेहतर और सुखमय जीवन की कामना,
-जीवन में उत्कृष्टता के लिए कोशिश
- अच्छे और प्रतिष्ठित कैरियर की तलाश 
- माता-पिता/परिवार/ शिक्षकों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने का ख़्वाब
- अपने सपनों को साकार करने की इच्छा, आदि।

अपने इन सपनों को साकार करने के प्रयासों की राह बहुत कठिन नहीं है, परंतु इतनी सरल और एकरेखीय भी नहीं है।  जिस तरह ज़िन्दगी बहुपक्षीय और बहुआयामी है, उसी तरह सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी की प्रक्रिया भी ठीक-ठाक लम्बी और उलझाऊ सी है। मेरी व्यक्तिगत राय है कि इस उलझन, बोझ, ऊहापोह और तनाव से निपटने का शानदार और ज़बरदस्त रास्ता बुद्ध के 'मध्यम मार्ग' में छिपा है।
बौद्ध दर्शन के प्रमुख सिद्धांतों में से एक मध्यम मार्ग को पाली साहित्य में 'मज्झिमा परिपदा' कहा गया है, जिसे सामान्य तौर पर अंग्रेज़ी में 'Middle Path' या 'golden mean' भी कहा जाता है। बुद्ध ने अति 'कायक्लेश' और 'भोगवाद' के बीच का 'मध्यम मार्ग' सुझाया और स्वयं भी उसी पर आगे बढ़े। बुद्ध का यह मध्यम मार्ग का दर्शन भारतीय औपनिषदिक समावेशी (inclusive) और सहिष्णु  (tolerant) चिंतन प्रक्रिया के काफ़ी नज़दीक है।

 मध्यम मार्ग का यह सिद्धांत वर्धमान महावीर के 'अनेकांतवाद' व 'स्यादवाद' के भी काफ़ी नज़दीक है। अनेकांतवाद सिखाता है कि कोई भी कथन स्वयं में पूर्ण (absolute) नहीं है। किसी भी बात या धारणा को एक नहीं, बल्कि अनेक पहलुओं से समझा जा सकता है। हर बात को समझने के कई दृष्टिकोण या नज़रिए हो सकते हैं। सात अंधे जब एक हाथी को अलग-अलग अंगों पर स्पर्श करते हैं, तो उसकी आकृति को लेकर अपनी अलग-अलग धारणाएँ बनाते हैं। कोई हाथी की पूँछ को छूकर उसे 'झाड़ू' समझता है, तो कोई उसके कान छूकर उसे 'पंखा'। उन सातों दृष्टिबाधित व्यक्तियों का अपना-अपना सत्य है, जो उनके नज़रिए से भले ही ठीक हो, पर ज़ाहिर है कि यह सत्य अधूरा है। इसी लिए अंग्रेज़ी में एक कहावत भी है- 'Truth lies somewhere in between.'
आप पाएँगे कि सत्य देश-काल-समाज-परिस्थिति सापेक्ष भी हो सकता है। उदाहरण के तौर पर पूरब के नैतिकता के मानदंड पश्चिम के मानदंडों से काफ़ी भिन्नता रखते हैं। कहीं मृत्युदंड अवैध और अनैतिक भी है, तो कहीं न्यायसंगत और वैध; कहीं समलैंगिक विवाह क़ानूनन व नैतिक तौर पर स्वीकार्य है, तो कहीं इस बारे में सोचना भी अनैतिक माना जाता है। इस तरह के तमाम उदाहरण हमारे आस-पास दिखते हैं, जिनसे हम आसानी से समझ सकते हैं, कि कैसे अपने-अपने नज़रिए के आधार पर लोग अपने सच का संसार निर्मित करते जाते हैं।
अनेकांतवाद और मध्यम मार्ग की इन अवधारणाओं को संक्षेप में समझने के बाद अब हम यह समझने की कोशिश करते हैं, कि सिविल सेवा परीक्षा या अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं सहित ज़िंदगी के हर मोड़ पर, किस तरह ये दोनों परस्पर पूरक से दिखने वाले सिद्धांत आपकी मुश्किल राह को आसान और सहज बनाने में मदद करते हैं।
- मुख्य परीक्षा में निबंध या सामान्य अध्ययन के प्रश्नों के उत्तर लिखते वक़्त एक बड़ा कंफ्यूजन इस बात को लेकर रहता है कि विचारों का संतुलन कैसे बनाएँ। इसमें निस्सन्देह मध्यम मार्ग मदद करता है। 
- एक बेहतर निबंध तभी लिखा जा सकता है, जब उसमें उस विषय के सभी सम्भव पहलुओं और पक्ष-विपक्ष पर पर्याप्त प्रकाश डालते हुए, विचारों को व्यवस्थित ढंग से अभिव्यक्त किया गया हो। इसमें अनेकांतवाद और मध्यम मार्ग, दोनों काफ़ी सहायक साबित हो सकते हैं।
- सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के दौरान सीखने की प्रवृत्ति (learner's attitude) होना काफ़ी काम आता है। यदि आप अतियों (extremes) की ओर न झुककर मध्यम मार्ग के हिमायती हैं, तो आप नयी चीज़ें सीखने के प्रति तत्पर रहते हैं, और दूसरों के विचारों का भी सम्मान करना सीखते हैं। यूँ भी ऋग्वेद में लिखा है- 'आ नो भद्रा कृतवो यंतु विश्वतः' (विश्व भर से श्रेष्ठ विचार हमारी ओर आएँ।)
-मुख्य परीक्षा और इंटरव्यू में अनेक बार किसी टॉपिक का विश्लेषण करते वक़्त निष्कर्ष में कोई स्पष्ट मत व्यक्त करना होता है। उस विश्लेषण को श्रेय मिलता है, जिसमें टॉपिक के विविध पहलुओं को व्यवस्थित ढंग से विश्लेषित कर अंत में एक संतुलित राय व्यक्त की जाए। स्पष्ट है कि ये दोनों सिद्धांत इस संतुलित दृष्टिकोण के निर्माण में काफ़ी मदद करते हैं।
- तैयारी की लम्बी और उबाऊ प्रक्रिया में कई बार असफलता का सामना भी करना पड़ सकता है। छोटी-छोटी असफलताओं को सम्भालना और उनमें विचलित हुए बग़ैर स्थिर रहना आज के तनाव भरे दौर में थोड़ा मुश्किल है। तैयारी के दौरान रोज़मर्रा की दिनचर्या में भी समय-समय पर विभिन्न कारणों से तनाव, निराशा या कुंठा की स्थितियाँ पैदा होती रहती हैं। ऐसा होना स्वाभाविक भी है। पर इन स्थितियों से निपटने में अनेकांतवाद और मध्यम मार्ग के साथ-साथ गीता का 'निष्काम कर्मयोग' भी काफ़ी सहायता करते हैं। नतीजों के प्रति आसक्त (attach) हुए बिना पूर्ण मनोयोग और पुरुषार्थ से काम करना, सिविल सेवा परीक्षा या किसी भी प्रतियोगी परीक्षा के लिए बेहद ज़रूरी और लगभग अनिवार्य सा ही है।
- परफ़ेक्शन की ज़िद और सब कुछ बेस्ट पाने की चाहत आज के दौर में युवाओं पर जुनून की हद तक सवार है। पर जब आप अनेकांतवाद की मदद से यह समझ पाते हैं, कि कुछ भी बेस्ट नहीं है, और कोई भी धारणा शत प्रतिशत सत्य नहीं है, तो आप ज़्यादा सहज होकर तैयारी कर पाते हैं।
- इंटरव्यू के दौरान आपकी विनम्रता और सहजता आपकी परफ़ोरमेंस पर काफ़ी सकारात्मक असर डालती है। जब आप दूसरों के विचारों और ज्ञान के अथाह भंडार का सम्मान करते हुए, आप ख़ूब पढ़ते-लिखते और समझते हैं, तो आपको ज्ञान की विराटता व ख़ुद की अल्पज्ञता का अहसास होता है। इसका असर यह होता है आप और विनम्र होते जाते हैं। किसी विद्वान ने कहा भी है- 'शिक्षा अपने अज्ञान की प्रगतिशील खोज है।' सुकरात जैसे दार्शनिक ने इसीलिए कहा था- 'मैं ज्ञानी इस अर्थ में हूँ कि मैं यह जानता हूँ कि मैं कुछ नहीं जानता।' 

सच तो यह है कि भारतीय दर्शन के ये तीनों सिद्धांत -निष्काम कर्मयोग, अनेकांतवाद और मध्यम मार्ग; सिविल सेवा परीक्षा सहित किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में ही नहीं, बल्कि ज़िंदगी के हर मोड़ पर आपको अधिक परिपक्व, सहज, संयत, सहिष्णु और सक्षम बनाते हैं। बशर्ते इनके सही अर्थ को समझकर, रोज़मर्रा के जीवन में इनका समावेश कर लिया जाए।
- निशान्त जैन 
(लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं)



Thursday, 23 March 2017

सतह पर ही न रहें, मर्म भी समझें ....


सतह पर ही न रहें, मर्म भी समझें....


किसी नगर में चार ब्राह्मण रहते थे। उनमें खासा मेल-जोल था। बचपन में ही उनके मन में आया कि कहीं चलकर पढ़ाई की जाए।
अगले दिन वे पढ़ने के लिए कन्नौज नगर चले गये। वहाँ जाकर वे किसी पाठशाला में पढ़ने लगे। बारह वर्ष तक जी लगाकर पढ़ने के बाद वे सभी अच्छे विद्वान हो गये।
अब उन्होंने सोचा कि हमें जितना पढ़ना था पढ़ लिया। अब अपने गुरु की आज्ञा लेकर हमें वापस अपने नगर लौटना चाहिए। यह निर्णय करने के बाद वे गुरु के पास गये और आज्ञा मिल जाने के बाद पोथे सँभाले अपने नगर की ओर रवाना हुए।
अभी वे कुछ ही दूर गये थे कि रास्ते में एक तिराहा पड़ा। उनकी समझ में यह नहीं आ रहा था कि आगे के दो रास्तों में से कौन-सा उनके अपने नगर को जाता है। अक्ल कुछ काम न दे रही थी। वे यह निर्णय करने बैठ गये कि किस रास्ते से चलना ठीक होगा।
अब उनमें से एक पोथी उलटकर यह देखने लगा कि इसके बारे में उसमें क्या लिखा है।
संयोग कुछ ऐसा था कि उसी समय पास के नगर में एक बनिया मर गया था। उसे जलाने के लिए बहुत से लोग नदी की ओर जा रहे थे। इसी समय उन चारों में से एक ने पोथी में अपने प्रश्न का जवाब भी पा लिया। कौन-सा रास्ता ठीक है कौन-सा नहीं, इसके विषय में उसमें लिखा था, ‘‘महाजनो येन गतः स पन्था।’’
किसी ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि यहाँ महाजन का अर्थ क्या है और किस मार्ग की बात की गयी है। श्रेणी या कारवाँ बनाकर निकलने के कारण बनियों के लिए महाजन शब्द का प्रयोग तो होता ही है, महान व्यक्तियों के लिए भी होता है, यह उन्होंने सोचने की चिन्ता नहीं की। उस पण्डित ने कहा, ‘‘महाजन लोग जिस रास्ते जा रहे हैं उसी पर चलें!’’ और वे चारों श्मशान की ओर जानेवालों के साथ चल दिये।
श्मशान पहुँचकर उन्होंने वहाँ एक गधे को देखा। एकान्त में रहकर पढ़ने के कारण उन्होंने इससे पहले कोई जानवर भी नहीं देखा था। एक ने पूछा, ‘‘भई, यह कौन-सा जीव है?’’
अब दूसरे पण्डित की पोथी देखने की बारी थी। पोथे में इसका भी समाधान था। उसमें लिखा था।
'उत्सवे व्यसने प्राप्ते दुर्भिक्षे शत्रुसंकटे।
राजद्वारे श्मशाने च यः तिष्ठति सः बान्धवः।'
बात सही भी थी, बन्धु तो वही है जो सुख में, दुख में, दुर्भिक्ष में, शत्रुओं का सामना करने में, न्यायालय में और श्मशान में साथ दे।
उसने यह श्लोक पढ़ा और कहा, ‘‘यह हमारा बन्धु है।’’ अब इन चारों में से कोई तो उसे गले लगाने लगा, कोई उसके पाँव पखारने लगा।
अभी वे यह सब कर ही रहे थे कि उनकी नजर एक ऊँट पर पड़ी। उनके अचरज का ठिकाना न रहा। वे यह नहीं समझ पा रहे थे कि इतनी तेजी से चलने वाला यह जानवर है क्या बला!
इस बार पोथी तीसरे को उलटनी पड़ी और पोथी में लिखा था, 'धर्मस्य त्वरिता गतिः'।
धर्म की गति तेज होती है। अब उन्हें यह तय करने में क्या रुकावट हो सकती थी कि धर्म इसी को कहते हैं। पर तभी चौथे को सूझ गया एक रटा हुआ वाक्य, 'इष्टं धर्मेण योजयेत' यानि प्रिय को धर्म से जोड़ना चाहिए।
अब क्या था। उन चारों ने मिलकर उस गधे को ऊँट के गले से बाँध दिया।
अब यह बात किसी ने जाकर उस गधे के मालिक धोबी से कह दी। धोबी हाथ में डण्डा लिये दौड़ा हुआ आया। उसे देखते ही वे वहाँ से चम्पत हो गये।
वे भागते हुए कुछ ही दूर गये होंगे कि रास्ते में एक नदी पड़ गयी। सवाल था कि नदी को पार कैसे किया जाए। अभी वे सोच-विचार कर ही रहे थे कि नदी में बहकर आता हुआ पलाश का एक पत्ता दीख गया। संयोग से पत्ते को देखकर पत्ते के बारे में जो कुछ पढ़ा हुआ था वह एक को याद आ गया। 'आगमिष्यति यत्पत्रं तत्पारं तारयिष्यति।' यानि आनेवाला पत्र ही पार उतारेगा।
अब किताब की बात गलत तो हो नहीं सकती थी। एक ने आव देखा न ताव, कूदकर उसी पर सवार हो गया। तैरना उसे आता नहीं था। वह डूबने लगा तो एक ने उसको चोटी से पकड़ लिया। उसे चोटी से उठाना कठिन लग रहा था। यह भी अनुमान हो गया था कि अब इसे बचाया नहीं जा सकता। ठीक इसी समय एक दूसरे को किताब में पढ़ी एक बात याद आ गयी कि यदि सब कुछ हाथ से जा रहा हो तो समझदार लोग कुछ गँवाकर भी बाकी को बचा लेते हैं। सबकुछ चला गया तब तो अनर्थ हो जाएगा।
यह सोचकर उसने उस डूबते हुए साथी का सिर काट लिया।
अब वे तीन रह गये। जैसे-तैसे बेचारे एक गाँव में पहुँचे। गाँववालों को पता चला कि ये ब्राह्मण हैं तो तीनों को तीन गृहस्थों ने भोजन के लिए न्यौता दिया। एक जिस घर में गया उसमें उसे खाने के लिए सेवईं दी गयीं। उसके लम्बे लच्छों को देखकर उसे याद आ गया कि दीर्घसूत्री नष्ट हो जाता है, दीर्घसूत्री विनश्यति। मतलब तो था कि दीर्घसूत्री या आलसी आदमी नष्ट हो जाता है पर उसने इसका सीधा अर्थ लम्बे लच्छे और सेवईं के लच्छों पर घटाकर सोच लिया कि यदि उसने इसे खा लिया, तो नष्ट हो जाएगा। वह खाना छोड़कर चला आया।
दूसरा जिस घर में गया था वहाँ उसे रोटी खाने को दी गयी। पोथी फिर आड़े आ गयी। उसे याद आया कि अधिक फैली हुई चीज की उम्र कम होती है, 'अतिविस्तार विस्तीर्णं तद् भवेत् न चिरायुषम्।' वह रोटी खा लेता तो उसकी उम्र घट जाने का खतरा था। वह भी भूखा ही उठ गया।
तीसरे को खाने के लिए ‘बड़ा’ दिया गया। उसमें बीच में छेद तो होता ही है। उसका ज्ञान भी कूदकर उसके और बड़े के बीच में आ गया। उसे याद आया, 'छिद्रेष्वनर्था बहुली भवन्ति।' छेद के नाम पर उसे बड़े का ही छेद दिखाई दे रहा था। छेद का अर्थ भेद का खुलना भी होता है, यह उसे मालूम ही नहीं था। वह बड़े खा लेता तो उसके साथ भी अनर्थ हो जाता। बेचारा वह भी भूखा रह गया।
लोग उनके ज्ञान पर हँस रहे थे पर उन्हें लग रहा था कि वे उनकी प्रशंसा कर रहे हैं। अब वे तीनों भूखे-प्यासे ही अपने-अपने नगर की ओर रवाना हुए।
यह कहानी सुनाने के बाद स्वर्णसिद्धि ने कहा, ‘‘तुम भी दुनियादार न होने के कारण ही इस आफत में पड़े। इसीलिए मैं कह रहा था शास्त्रज्ञ होने पर भी मूर्ख मूर्खता करने से बाज नहीं आते।’’
                पंचतंत्र की यह रोचक कहानी स्वयं में बहुत से निहितार्थ समेटे हुए है। पढ़े-लिखे होकर भी लकीर के फ़क़ीर बने रहने वाले इन चार विद्यार्थियों की यह कहानी थोड़ी अतिशयोक्तिपूर्ण ज़रूर लगती है, पर यह प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर हमें ज़िंदगी और साथ ही परीक्षा की तैयारी के लिए दिशा देने का काम भी करते है। आइए, चर्चा करें-
आपके अंग्रेज़ी का एक मुहावरा सुना होगा, 'Reading between the lines'। साथ ही एक और मुहावरा है, 'in black and white.' पहले मुहावरे का अर्थ है, जो स्पष्ट तौर पर लिखा हुआ नहीं दिख रहा है, उसके वास्तविक अर्थ या मर्म (essence) को समझना। दूसरे मुहावरे का अर्थ है, सब कुछ एकदम स्पष्ट होना और कोई कंफ्यूजन न होना। reading between the lines की प्रासंगिकता नए पैटर्न में इसलिए ज़्यादा है क्योंकि सब कुछ in black and white उपलब्ध नहीं होता। कहने का मतलब यह है, कि किसी भी कथन या अध्ययन सामग्री का शाब्दिक (literal) अर्थ पकड़कर लकीर के फ़क़ीर बनने के बजाय उसका निहित अर्थ या वास्तविक मर्म/अभिप्राय समझना ही आज की माँग है।
                 संघ लोक सेवा आयोग और राज्य लोक सेवा आयोगों के नए पैटर्न में आप यह बदलाव महसूस करेंगे कि अब लकीर के फ़क़ीर बने रहकर या चीज़ों को केवल कंठस्थ करके सफलता पाना सम्भव नहीं है, जब तक उनके अर्थ या मर्म को हृदयंगम न  कर लिया जाय। चाहे वैकल्पिक विषय की अवधारणाएँ हों या करेंट अफ़ेयर्स का आधारभूत सामान्य अध्ययन से सम्बंध; निबंध के लिए सामान्य समझ हो या एथिक्स में एक संतुलित दृष्टिकोण; इन सबके लिए ही पाठ्यक्रम के मर्म और अपेक्षा को समझते हुए अपनी समझ का विस्तार करना ज़रूरी है।
            आइए, समझने की कोशिश करें कि किन आसान तरीक़ों की मदद से हम सतही ज्ञान से गहन और मार्मिक ज्ञान की ओर बढ़कर सफलता की सम्भावनाओं को बढ़ा सकते हैं:-
- जब भी कोई नया विषय या टॉपिक पढ़ें, तो सबसे पहले उसे तसल्ली से सरसरी तौर पर बिना किसी दबाव के, पढ़ लें।
- इस दौरान कोशिश करें कि महत्वपूर्ण बिंदुओं या अंशों को रेखांकित (underline) या हाईलाइट करते चलें। ध्यान रहे, बहुत ज़्यादा हिस्सा रेखांकित न हो।
- जब आपका किसी नए पारिभाषिक शब्द (terminology) या नयी अवधारणा (concept) से हो, तो उसको अलग से नोट करके उसका अर्थ समझने की कोशिश करें। इसके लिए किसी कोश या विकिपीडिया/इंटरनेट का भी सहारा ले सकते हैं। यदि ज़रूरत महसूस हो तो किसी संदर्भ ग्रंथ (reference book) की भी मदद ले सकते हैं।
- पढ़ना एक बात है और उसे समझना व उस पर मनन करना दूसरी। अधिगम (learning) की प्रक्रिया, पढ़ने के साथ-साथ रिवीज़न, चिंतन-मनन और श्रवण (listening) और चर्चा (discussion) से होकर पूर्ण होती है। अतः सतही ज्ञान से आगे बढ़ने के लिए पढ़ाई के इन आवश्यक घटकों का भी भरपूर इस्तेमाल करें। इस बात का भी ध्यान रखें कि आपको इस परीक्षा में सफलता के लिए विशेषज्ञ (specialist) नहीं, सामान्यज्ञ (generalist) ही बनना है।
- उपनिषद में कहा गया है कि 'वाद-विवाद-संवाद से तत्वबोध होता है', लिहाज़ा चर्चा के लिए हमेशा सहज रहें।
- दूसरों के विचारों का सम्मान करना सीखें और सहिष्णु बनें ताकि निरंतर कुछ नया सीख सकें।
- हमेशा सीखने को तैयार रहें और चारों और से बेहतर विचारों (ideas) को अपनी ओर आने दें।
- परीक्षा की तैयारी के दौरान सामान्य अध्ययन के विभिन्न खंडों (segments) को बिलकुल अलग-अलग मानकर न देखें। इन्हें परस्पर कनेक्ट करके समझें। ये विभिन्न खंड आपस में जुड़े होते हैं और एक क्षेत्र में हुए बदलाव का असर दूसरे क्षेत्र पर भी पड़ता है। 
- अध्ययन सामग्री को व्यवस्थित करना भी ज़रूरी है। एक टॉपिक के लिए बहुत सारे स्त्रोतों को पढ़ने की ज़रूरत नहीं है।स्त्रोतों में आवश्यकतानुसार विविधता रखें और जो भी टॉपिक जहाँ से भी पढ़ें, उसे कहीं डायरी में नोट भी कर लें।
- नए पैटर्न के मुताबिक़, सतही ज्ञान आपको बहुत आगे तक नहीं ले जा सकता। आपके उत्तर पढ़कर आपके ज्ञान और समझ के स्तर का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। अतः अपने उत्तरों को अधिक परिपक्व (mature) बनाने के लिए सतही ज्ञान से आगे बढ़ें और मर्म तक पहुँचने की कोशिश करें।

-निशान्त जैन 
(लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं)