Monday, 2 September 2019

क्या हैं जैन पर्व : पर्यूषण, क्षमावाणी और दशलक्षण.....

क्या हैं पर्यूषण, क्षमावाणी और दशलक्षण.....

आज-कल आप अख़बार और सोशल मीडिया पर 'पर्यूषण पर्व', 'क्षमावाणी पर्व','दशलक्षण पर्व' और 'सम्वत्सरी' के बारे में पढ़-देख रहे होंगे। लोग साल भर की ग़लतियों और भूलों के लिए एक-दूसरे से क्षमा माँग रहे हैं तो कुछ लोग व्रत-तप-संयम में लीन होकर आत्मसाधना में जुटे हैं। आइए जानते हैं- क्या है जैन समाज के इन पर्वों का मतलब:-


सावन के बाद आने वाला भादों (भाद्रपद) का महीना जैन धर्म के अनुयायियों के लिए बेहद पवित्र है। जैन समुदाय के दोनों सम्प्रदायों- दिगंबर और श्वेतांबर, के लिए यह पूरा माह आत्मशुद्धि और सार्वभौम क्षमा को समर्पित है। भादों के महीने का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पर्व है- पर्यूषण, जो श्वेतांबर जैनों के लिए आठ और दिगम्बर जैनों के लिए दस दिनों का होता है। पर्यूषण का अर्थ है- ख़ुद के निकट आना। पर्यूषण पर्व तप-त्याग-संयम और क्षमा का पर्व है। ज़्यादातर लोग उपवास के माध्यम से तप-साधना करते हैं।


श्वेतांबर जैन समुदाय के लिए पर्यूषण पर्व आठ दिनों का होता है, जिसका अंत सम्वत्सरी पर होता है। सम्वत्सरी के अगले दिन दिगम्बर जैनों के दस दिन के पर्यूषण शुरू होते हैं। इन दस दिनों में धर्म के दस लक्षणों की आराधना के कारण दिगम्बर लोग इसे 'दशलक्षण पर्व' के नाम से भी जानते हैं। धर्म के दस लक्षण हैं- क्षमा, मार्दव (मान का अभाव), आर्जव (छल-कपट से दूर रहना), शौच(पवित्रता), सत्य, संयम, तप, त्याग, अकिंचन (सहजता और परिग्रह से दूर रहना) और ब्रह्मचर्य (सदाचार)। दिगम्बर जैन समुदाय के दस दिन चलने वाले पर्यूषण का समापन 'अनंत चतुर्दशी' और फिर 'क्षमावाणी' के साथ होता है। अनंत चतुर्दशी पर लोग साल भर के व्रतों का पारायण करते हैं। दिगम्बर समाज के लोग इस दिन नगर में तीर्थंकर भगवान की रथयात्रा भी निकालते हैं।


'सम्वत्सरी' और 'क्षमावाणी' क्षमा के दिन हैं। मेरी समझ में दुनिया के किसी भी धर्म-समुदाय में क्षमा का कोई त्यौहार नहीं है, इस तरह यह एक अनूठा पर्व है। घर-परिवार से लेकर समाज तक, सब एक-दूसरे से माफ़ी माँगते हैं और दूसरों को सहर्ष माफ़ करते भी हैं। 'सबसे क्षमा-सबको क्षमा' इस पर्व का मूलमंत्र है। सब प्राकृत भाषा में 'मिच्छामी दुक्कड़म' कहकर एक-दूसरे से हृदय से क्षमा माँगते हैं। जैनों को क्षमा का विस्तार मनुष्य तक ही नहीं प्राणीमात्र तक है-



"खामेमि सव्व जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे,
मिती मे सव्व भुए सू, वैरम मज्झ न केवई।"
(प्राकृत)

"I grant forgiveness to all, May all living beings grant me forgiveness.
My friendship is with all living beings, My enemy is totally non-existent."
(English Translation)

-निशान्त जैन 

Monday, 29 April 2019

फूलों का राजा...

अगर होता मैं फूलों का राजा!

कमल-गुलाब-गेंदा-कनेर
मानते सब कहना मेरा,
महकाता मैं हर बगिया को
होता खुशबू का डेरा।

फूलों के आसन पे बैठ मैं
अपना हुकुम चलाता,
फूल तोड़नेवाले को मैं
कड़ी  सजा दिलवाता।

दुनिया के कोने-कोने से
बदबू  दूर  भगाता,
चाँद-तारों से घुल-मिलकर मैं
बातें   खूब   बनाता।

© निशान्त जैन

बाल कविता संकलन 'शादी बन्दर मामा की' में संकलित।

अपना रिक्शेवाला...

रुकता न थकता है कभी, न काम से जी वो चुराए,
मन में हरदम गूँज लगन की, गाने श्रम के गाए।

उठते हम जब सोते-जगते, आलस में ही रहते,
लेने हमें पहुँचता हरदम, मोनू-पिंकी कहते।

सवारियों को ढोकर आए, चाहे जितना पसीना,
चिल्ले का जाड़ा हो या हो, जालिम जेठ महीना।

दुःख-सुख जीवन दो पहिए, जाने मन से बात,
हँसता-खिलता चलता जाए, दिन हो या हो रात।

मन में न एक पल भी निराशा, रहता मगन हमेशा,
आशाओं के फूल खिला लो, देता यही संदेशा।

© निशान्त जैन

बाल कविता संकलन 'शादी बन्दर मामा की' में संकलित।

धन्य-धन्य हे दो अक्तूबर!...

गांधी-शास्त्री के गुण गाते,
धन्य-धन्य हे दो अक्तूबर!

बापू की तुम याद दिलाते,
सत्य-अहिंसा तुम समझाते,
प्रेम का सागर देते हो भर!

लाल बहादुर सीधे-सादे,
ठाने पर मजबूत इरादे,
उनकी यादों की तुम गागर।

सबका दुःख अपना दुःख मानें,
एक-दूजे के भले की ठानें,
इसी प्रेरणा के तुम सागर!

देश की खातिर मिट जाएँ हम,
राष्ट्र-उदय को जुट जाएँ हम,
इसी भाव से भर दो हर घर!

इंतजार में रहते हम सब,
नए वर्ष आओगे तुम कब,
आते जब लेते बुराई हर!

हुए जरूरी देश की खातिर,
बापू के आदर्श आज फिर,
अपनाएँ सब शीश झुकाकर!

राष्ट्रपिता के शौर्य की जय हो,
शास्त्रीजी के धैर्य की जय हो,
इन नारों से गूँजे अंबर!

© निशान्त जैन

बाल कविता संकलन 'शादी बन्दर मामा की' में संकलित।

काका कलाम...

भारत के हर बच्चे के हैं,
दिल में बसते काका कलाम!

सकारात्मक ऊर्जा भरते
हो बाधाएँ कभी न डरते,
बड़े निराले बाल हैं उनके
बड़े निराले उनके काम।

सपने  पूरे  होंगे  तब
मिल-जुलकर हम रहेंगे जब,
जितने प्यारे पैगंबर हैं
उतने प्यारे हमको राम।

सोच बड़ी और स्वप्न नया
भारत को वह ‘विजन’ दिया,
जुड़ जाए विज्ञान धर्म से
हो जाए जग का कल्याण।

गाँव-गाँव पहुँचें सुविधाएँ
हर व्यक्ति शिक्षित हो जाए,
महाशक्ति भारत बन जाए
दुनिया में हो जाए नाम!

© निशान्त जैन

बाल कविता संकलन 'शादी बन्दर मामा की' में संकलित।

पढ़ें-पढ़ाएँ...

आओ मिल सब पढ़ें-पढ़ाएँ,
घर-घर ज्ञान का दीप जलाएँ।

जब से सीखा हमने पढ़ना,
चाहे मन पंछी-सा उड़ना,
बच्चे-बूढ़े सब चिट्ठी से,
मन की बात लिखें-पहुँचाएँ।

अंधकार-अज्ञान मिटेगा,
ज्ञान का सूरज नया खिलेगा,
इसी आस में अरमानों के,
बगिया में हैं फूल खिलाए।

जागे अपने हित की खातिर
जाएँगे दुखड़े सारे फिर,
नाम लिखें सबके सब अपना,
अँगूठा न कोई लगाए।

हो संकल्प हमारा अब से,
प्रेमभाव रखेंगे सबसे,
समझें जिम्मेदारी अपनी,
दूजों को भी संग सिखाएँ।

© निशान्त जैन

बाल कविता संकलन 'शादी बन्दर मामा की' में संकलित।

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ!...

बेटी  से  रोशन  ये  आँगन
बेटी  से  ही  अपनी  पहचान,
हर लम्हे में खुशी घोलती
बेटी से ही अपनी शान।

शिक्षा - स्वास्थ्य - रोजगार
विज्ञान हो या संचार,
तेरी काबिलियत के आगे
नतमस्तक सारा संसार।

गाँव-शहर-कस्बों में बेटी
पढ़ती - बढ़ती  जाए,
नई चेतना से आओ अब
अपना देश जगाएँ।

धूमधाम   से   जन्में   बेटियाँ
पढ़कर  ऊँचा  कर  दें  नाम,
आओ  बेटियों  के  सपनों  में
भर  दें  मिलकर  नई  उड़ान।

© निशान्त जैन

बाल कविता संकलन 'शादी बन्दर मामा की' में संकलित।
(जिला मजिस्ट्रेट, केन्द्रीय जिला, दिल्ली द्वारा वर्ष  2016 में जनहित में जारी)  

राष्ट्र आज उनकी जय बोल!...

मिटे प्राण की बलि चढ़ाकर,
डटे राष्ट्र की पूजा गाकर,
जिनकी रक्त लालिमा से है,
पाई आजादी अनमोल!

खुली हवा में साँस मिली है,
खुशहाली की आस मिली है,
वंदन उनका करने को तू
हृदयों के दरवाजे खोल!

जाति-धर्म के तोड़ें बंधन,
भूल भेद महके ज्यों चंदन,
उनसे तुलना करके अपनी,
खुद से उनका जज्बा तोल!

शपथ आज उनकी हम खाएँ,
सपने उनके फिर चमकाएँ,
भेदभाव के कड़वे रस को,
प्रेम-चाशनी में तू घोल!

त्याग सदा वह अमर रहेगा,
शौर्य सदा वह अजर रहेगा,
वीर शहीदों की देनों का,
कौन चुका सकता है मोल?

© निशान्त जैन

बाल कविता संकलन 'शादी बन्दर मामा की' में संकलित।

सर्दी दीदी फिर न आना!...

कान पकड़ते हैं बच्चे सब,
सर्दी दीदी फिर ना आना।

छोड़ काम घर में सब दुबके
भूल खेल बच्चे हैं छुपके,
गली-मोहल्ले की सड़कों पर
सन्नाटा  छाया  वीराना।

पेंसिल छूटे अब हाथों से
कोहरा निकले अब साँसों से,
सच पूछो तो बच्चों का है
ना पढ़ने का नया बहाना।

सर्दी  तुम  कितनी  बेदर्दी
अब तो सचमुच हद ही कर दी,
अंग जमाए तन के सारे
बहुत हुआ छोड़ो भी सताना।

सूरज से दुश्मनी तुम्हारी
हाथापाई  -  मारामारी,
कुछ गुस्सा कम करो अगर तुम
हो जाए मौसम मस्ताना।

कोहरा-पाला-ओस गिराए
फिर भी चैन तुम्हें न आए,
हाथ जोड़ करते हैं विनती
बंद करो यह खेल दिखाना।

© निशान्त जैन

बाल कविता संकलन 'शादी बन्दर मामा की' में संकलित।

उमड़-घुमड़कर बरखा आई...

काली घोर घटा है छाई,
उमड़-घुमड़कर बरखा आई।

भर गगरी जल बादल लाए
धीमे-धीमे से मुसकाए,
बहे मलय के छोर से प्यारी
मंद-मंद मीठी पुरवाई।

फूलों में है नई ताजगी
खुशबू में है नई सादगी,
पत्तों पर जब बूँद चमकती
सचमुच मोती पड़ें दिखाई।

बरखा रानी बड़ी सयानी
हँसमुख चंचल सी मस्तानी,
आती हो बस बादल के संग
हुई ज्यों उसके साथ सगाई।

राहुल-रोहन चले नहाने
नई फुहार का मजा उठाने,
जाओगे तो गिर जाओगे
यों चिल्लाकर बोली ताई।

चेहरों पर है चमक निराली
मुसकानें खेलें मतवाली,
मस्ती में झूमें सब ऐसे
ज्यों दीवाली-ईद मनाई।

© निशान्त जैन

बाल कविता संकलन 'शादी बन्दर मामा की' में संकलित।

होली का त्यौहार...

हिलता-खिलता-मिलता-जुलता,
आया  होली  का  त्यौहार।

नाचे तन-मन, नाचे जीवन
नाचे आँगन, नाचे उपवन,
रंग-बिरंगी  ओढ़  चदरिया
धरती  लाई  नई  बहार।

टेसू  महके,  चहके  पंछी
धुन में अपनी हंस-हंसिनी,
चोंच मिलाकर करें ठिठोली
करें  सवेरे  का  सत्कार।

अंबर चला बाँध के सेहरा
लिये संग तारों का पहरा,
लगता  मानो  धरा-वधू  की
डोली  लेने  आए  कहार!

शीत बीत दिन हुए सुहाने
कुनमुनी धूप लगी मस्ताने,
हँसी-खुशी की, खेल-मेल की
राग-रंग की लगी है धार।

ऊँच-नीच क्या, बैर-खार क्या
छोट-बड़न क्या, जात-पाँत क्या,
भेद  मिटा  गोरे-काले  का
दसों दिशा में उमड़ा प्यार।

झगड़े-झंझट  और  झमेले
छोड़, भुला दो बैर कसैले,
फागुन की मदमस्त बयारें
आई  हैं  करने  मनुहार।

© निशान्त जैन

बाल कविता संकलन 'शादी बन्दर मामा की' में संकलित।

ईद...

मुसलमान हो या हिंदू हों,
ईद सभी का है त्यौहार।

मिलकर सबको गले लगाएँ
भूल बैर बस झूमें-गाएँ,
आओ सुखविंदर-रोहित-क्रिस
आओ कविता और रुखसार।

गरम पकौड़े और पकवान
गजब जायके के सामान,
देख सिवइयाँ ललचाए हैं,
बच्चे आदत से लाचार।

‘ईदी’ दी अब्बा ने मुझको
कहा बाँट दो सबमें इसको,
झूलें झूला संग-साथ सब
नहीं खुशी का पारावार।

रोजों में जो गुण हैं सीखें
क्यों न उनको आगे खींचें,
बेमतलब की बात भूलकर
करें द्वेष का बंटाधार।

हिंदू-मुसलिम  भाई-भाई
ईद  यही  संदेशा  लाई,
जीने का मतलब सिखलाती
तोड़े मजहब की दीवार।

© निशान्त जैन

बाल कविता संकलन 'शादी बन्दर मामा की' में संकलित।

गरमी की सौगात...

गरमी की भी भैया सचमुच अजब-गजब है बात,
हँसी-खुशी की, मौज-मजे की, लाई है सौगात।

मोटी-मोटी पोथी-पत्री से मुक्ति है,
मार-पिटाई फटकारों से अब छुट्टी है,
फिरें गली-कूचे में बच्चे बिल्कुल खाली हाथ।

टंटे-झगड़े-रगड़े-झंझट सब निपटे हैं,
छुटकू-बड़कू-लड़कू खुशियों से लिपटे हैं,
कुल्फी-चुस्की लगी चूसने मोहल्लों की जमात।

खाने-पीने के शौकीनों की है आई मौज,
आम ही नहीं संग है लाई फलों की लंबी फौज,
खीरा-खरबूजा-तरबूजा, लाई ककड़ी साथ।

चाहे जितना खेलें-कूदें मरजी अपनी,
हसरत पूरी कर लें सारी दिल की अपनी,
पना और शिकंजी पीकर, दें गरमी को मात।

साल-साल भर इंतजार इसका करते हैं,
हो न जाए खतम ये मौसम बस डरते हैं,
पापा चलो पहाड़ जल्द, आ जाएगी बरसात।

© निशान्त जैन

बाल कविता संकलन 'शादी बन्दर मामा की' में संकलित।

रेल...

छुक-छुक करती आती रेल,
सबके मन को भाती रेल।

गार्ड ने झंडी हरी दिखाई,
रेल ने जब रफ्तार बनाई।

लगता जैसे भागते पेड़,
कहते मुझको न तू छेड़।

हवा से करती बातें रेल,
मन को खूब लगाती रेल।

सूरज कहता जाऊँ मैं,
पास न तेरे आऊँ मैं।

चाचू सूरज नाराज हैं,
थोड़े तुनकमिजाज हैं।

सरपट दौड़ी जाए रेल,
कैसे खेल दिखाए रेल।

नदी-पहाड़ हैं बड़े-बड़े,
कभी न हिलते अड़े-खड़े।

इतने यात्री ठसे पड़े,
ऊपर भी कुछ चढ़े-खड़े।

कितने यात्री ढोए रेल,
कुछ न फिर भी बोले रेल।

अगला स्टेशन ज्यों आया,
रेल ने पों-पों राग बजाया।

समझा मैं अब आया घर,
उतरें हम सब जल्दी कर।

सबको गले लगाती रेल,
थकती न अलसाती रेल।


© निशान्त जैन

बाल कविता संकलन 'शादी बन्दर मामा की' में संकलित।

स्वागत है नए साल!...

नई उमंग लिये आए प्रिय,
स्वागत  है  नए  साल।

भूलें दुःख, बिसरें सारे गम,
हँसी-खुशी का साथ हो हरदम
चिंताएँ   दें   टाल!

मन की झोली में भर लें हम
ठंडी-मीठी हवा का मौसम,
हो  मतवाली  चाल!

गीत नए अंदाज नया हो
लहर नई अहसास नया हो,
सुरमय  हों  लय-ताल!

बैर-लड़ाई मिट जाएँ सब
झगड़े-रगड़े पिट जाएँ सब,
कटें  द्वेष  के  जाल!

लें संकल्प प्रेम का सबसे
कर्म मंत्र अपनाएँ अब से,
होंगे  तभी  निहाल!

नई चमक हो देश में अपने
सच हो जाएँ सारे सपने,
झुके  न  अपना  भाल!

खिल जाएँ मुरझाए चेहरे
ज्यों हों सुरभित पुष्प सुनहरे,
हो  बस  यही  कमाल!

© निशान्त जैन

बाल कविता संकलन 'शादी बन्दर मामा की' में संकलित।

माँ...

बूँद प्यार की बस उड़ेलती,
आँगन की फुलवारी माँ।

खेल-खेल में मुन्नू की है,
बनती रोज सवारी माँ।

मुश्किल चाहे झंझट कितने,
गाती राग मल्हारी माँ।

बिन नागा के सुबह-सवेरे,
देती  रोज  बुहारी  माँ।

थककर भी एक शिकन न लाए,
जादू भरी पिटारी माँ।

मुश्किल बिन माँ के एक पल भी,
सचमुच जग से न्यारी माँ।

जग सारा हो एक तरफ पर,
एक  अकेली  भारी  माँ।

© निशान्त जैन

बाल कविता संकलन 'शादी बन्दर मामा की' में संकलित।
(दैनिक ट्रिब्यून, 26 नवंबर 2006 में प्रकाशित)

गिफ्ट (लघुकथा)

श्याम नाम था उसका। युवावस्था की दहलीज पर खड़े सागर के घर से दो घरों के फासले पर स्थित भैंसों के तबेले पर दूध की डेरी चलाने वाले अपने पिता के साथ रहता था वह पाँच साल का हँसमुख बच्चा। गली में रहने वाले उसकी पीढ़ी के बच्चे समूह बनाकर खेलते। श्याम भी निहारता था तबेले से झांकता हुआ, उन 'बड़े' वर्ग से सम्बन्ध रखने वाले बच्चों को। श्याम और उसके हमउम्र बच्चों में दिन में एकाध बार निर्दोष मुस्कुराहटों का आदान-प्रदान हो जाता था। बच्चे क्या जानें बाहरी दुनिया के फासले? उनका संसार जात-पांत, ऊँच-नीच, बड़े-छोटे की दीवारों से कोसों दूर जो था। धीरे-धीरे श्याम बच्चों से घुल-मिल सा गया था। सागर जब भी घर से निकलता, तो श्याम अपनी मासूम सी मुस्कान बिखेर ही दिया करता था।

ग्रेजुएशन के एग्जाम की तैयारी में जुटा सागर एक दिन अपने कमरे में पढ़ता-पढ़ता कुछ आवाज़ें सुनकर चौंका। बराबर वाले कमरे में रहने वाली अपनी चाची को रेलिंग पर खड़े हुए अपनी जेठानी-देवरानी से बतियाते सुना- 'तो क्या हुआ अगर वो नीची जात का है? एक मासूम सा मन तो उसका भी है। अगर संयम के बर्थ डे पर उसके दोस्तों में से मैंने श्याम को ही नहीं बुलाया, तो कितना दिल दुखेगा उसका। आखिर वो भी तो मेरे बच्चे जैसा ही एक बच्चा है।' सुनकर सागर अपनी चाची की संवेदनशीलता पर गौरवान्वित महसूस कर रहा था। आखिर संवेदनशील सागर को मासूम श्याम से लगाव और अपनापन सा जो था। उसने भी चाची के इस नेक प्रस्ताव का नैतिक समर्थन किया।

क्या चमक थी श्याम की आँखों में, जब शायद ज़िन्दगी में पहली बार उसने कोई बर्थ डे पार्टी अटेंड की थी। खुशनुमा माहौल में संपन्न इस पार्टी के बाद चाची के कमरे में संयम के दोस्तों से मिले उपहारों को खोलने की रस्म अदायगी शुरू हुई। सागर अपने बराबर वाले स्टडी रूम में पढ़ाई में व्यस्त इस सबसे बेखबर ही था। तभी चाची के कमरे में गूंजी एक फटकार ने सागर का ध्यान खींचा। 'अरे संयम! दोबारा गिन। बच्चे तो मैंने बारह बुलाये थे पर ये गिफ्ट ग्यारह कैसे?' चाची ने लगभग चिल्लाते हुए अपने बेटे संयम को कहा।


'मम्मी, मैं बिलकुल अच्छी तरह गिन चुका हूँ, कोई दोस्त ज़रूर बिना गिफ्ट लिए आया होगा।' संयम बोला।
'जल्दी इनकी चिटों पर नाम पढ़। मुझे तो लगता है कि वो श्याम का बच्चा ही मुफ्त की दावत उड़ाकर गया है।' चाची चिल्लाईं।
'शायद ऐसा ही हो मम्मी, उसका नाम किसी चिट पर है भी नहीं।' संयम डरते हुए बोला।
'नीची जात वाले तो नीची जात के ही होते हैं। आज से संयम का उस कलुए के साथ खेलना बंद।'

चाची के इन चुभते शब्दों से हैरान और चेतनाशून्य सा होकर सागर किताब बंद कर कमरे से भागा। कहीं बराबर बरसते शब्दबाण उसके सब्र का बांध न तोड़ दें।

Saturday, 27 April 2019

मेरा नया दोस्त फेसबुक!...

किए नए फोटो ‘अपलोड’,
कितने ‘लाइक’ मिलते रोज,
होती है मन में धुक-धुक,
मेरा नया दोस्त फेसबुक।

शेयर करेंगे मन की बात,
मिले ‘कमेंट’ भी हाथों हाथ
प्रोफाइल का नया है लुक।

स्कूल की मिलती ‘अपडेट’
क्या कर रहे नया क्लासमेट
पीछे रहने की क्या तुक!

चेतन भगत या ओबामा,
सचिन हो या फिर हो साइना,
सबको बना ‘फ्रेंड’ न रुक।

नए-पुराने दोस्त मिले,
बचपन के सब रंग खिले,
नए ‘फेस’ हैं, नई है ‘बुक’।

चेहरों की है एक किताब,
सबका पूरा रखे हिसाब,
रिश्ता है थोड़ा नाजुक।
मेरा नया दोस्त फेसबुक!

© निशान्त जैन

बाल कविता संकलन 'शादी बन्दर मामा की' में संकलित।

मुर्गे का घमंड...

मुर्गा बोला यूँ मुर्गी से
हूँ मैं सबसे हटकर,
जंगल सारा जाग उठे जब
देता बाँग मैं डटकर।

कलगी मेरी जग से सुंदर
चाल मेरी मस्तानी,
उड़ न सकूँ भले जीवन भर
हार कभी न मानी।

मुर्गी बोली फिर मुर्गे से
बस  छोड़ो  इतराना,
अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बन
अपनी - अपनी  गाना।

करके देखो एक दिन ऐसा
मत देना तुम बाँग,
मानूँ तुम्हें मैं तीसमार खाँ
रुका रहे जो चाँद।

© निशान्त जैन

बाल कविता संकलन 'शादी बन्दर मामा की' में संकलित।
(दैनिक जनवाणी, 8 अप्रैल 2012  में प्रकाशित)

मोबाइल का कमाल...

बोले बच्चे चीज है ये
मोबाइल बड़ी कमाल।

हों पहाड़ पर या जंगल में,
धरती पर हों या अंबर में,
चुटकी भर में बात कराए,
कैसा  किसका  हाल।

मम्मी के मन चिंता छाई,
बबली अब तक क्यों न आई,
फोन मिलाया एक मिनट में,
बिन  पिचकाए  गाल।

चिट्ठी के दिन जब से बीते,
दादाजी  थे  रीते-रीते,
अब मोबाइल पर मैसेज से,
करते  रोज  धमाल।

चलते-फिरते बात करें हम,
लेटे-बैठे याद करें हम,
मम्मी बोली, देखो जी अब
इन बच्चों की चाल।

रेल में हों या कोई रैला,
तार-वार का नहीं झमेला,
नए दौर की पीढ़ी से है,
बैठी  इसकी  ताल।

© निशान्त जैन

बाल कविता संकलन 'शादी बन्दर मामा की' में संकलित।
(अमर उजाला, 13 अक्तूबर 2007 में प्रकाशित)