Saturday, 21 January 2017

कैसे करें वैकल्पिक विषय- हिन्दी साहित्य की तैयारी (Optional Subject- Hindi Literature for UPSC CSE)

कैसे करें वैकल्पिक विषय- हिन्दी साहित्य की तैयारी

चूँकि सिविल सेवा मुख्य परीक्षा में मेरा वैकल्पिक विषय 'हिन्दी भाषा का साहित्य' था, जिसमें मुझे सौभाग्य से 500 में से 313 अंक प्राप्त हुए थे, जो 2013 में बदले नए पैटर्न के बाद अभी तक प्राप्त जानकारी के मुताबिक़ सर्वाधिक हैं। ऐसे अभ्यर्थी, जिन्होंने सोच-विचारकर इसी विषय को मुख्य परीक्षा में चुना है, मैं उनके लिए इस विषय के बारे में कुछ विस्तार से प्रकाश डालने की कोशिश करूँगा।
क्यों चुनें -
- अंकदायी विषय
- हिन्दी माध्यम के लिए सुरक्षित विषय
- सहज, रुचिकर और आनंददायी विषय
- 3-4 माह में तैयारी संभव
- करेंट अफेयर्स से अपडेट करने की ज़रूरत नहीं 
- निश्चित और स्पष्ट पाठ्यक्रम
- लेखन कौशल का विकास।  निबंध, एथिक्स में मिल सकता है फायदा।
- विषय का बैकग्रॉउंड ज़रूरी नहीं। यद्यपि मैंने हिन्दी साहित्य में M.A., M.Phil. किया है पर अधिकांश सफल अभ्यर्थियों की पृष्ठभूमि साहित्य की नहीं होती। (एक उदाहरण- CSE 2014 में रैंक 49, पवन अग्रवाल ने इंग्लिश मीडियम से परीक्षा उत्तीर्ण की, पर वैकल्पिक विषय हिन्दी साहित्य था )
क्यों न चुनें -
- यदि हिन्दी भाषा को लिखने या पढ़ने में भी दिक्कत हो,
- विषय का दायरा व्यापक, पढ़ने को बहुत कुछ,
- भाषा-साहित्य बिल्कुल पसंद न हों।
- सामान्य अध्ययन में यह विषय मदद नहीं करता।
तैयारी कैसे करें-
हिन्दी साहित्य मेरा पसंदीदा विषय है। इसे पढ़कर मुझे अजीब सा सुकून मिलता है। सिविल सेवा परीक्षा के वैकल्पिक विषयों की सूची में भी हिन्दी साहित्य अभ्यर्थियों का एक पसंदीदा विषय है। हिंदी माध्यम के छात्रों का इस विषय की ओर सहज रुझान रहा है। इस विषय की लोकप्रियता का कारण इसका रुचिकर होने के साथ-साथ अंकदायी होना भी है। आइये, बात करते हैं हिन्दी साहित्य को वैकल्पिक विषय के रूप में लेने वालों के लिए, बेहतर प्रदर्शन के कुछ जरुरी बिन्दुओं की :
-पाठ्यक्रम में निर्धारित सभी पुस्तकों को पढ़ जरूर लें, ताकि व्याख्या करते समय सही सन्दर्भ लिख सकें।
-व्याख्या खंड में सही सन्दर्भ पहचानना बेहद ज़रूरी है। पद्य खंड में सन्दर्भ पहचानना आसान होता है और व्याख्या करना कठिन। जबकि गद्य खंड में सन्दर्भ पहचानना कठिन होता है और व्याख्या करना आसान।
 -पूरे पाठ्यक्रम को एक बार पढ़ जरूर लें ताकि सब लेखकों और उनकी निर्धारित रचनाओं  के बारे में आपको बेसिक जानकारी जरूर हो, ताकि मुश्किल वक़्त में उसका प्रयोग कर पाएं। अब नए पैटर्न में चयनात्मक अध्ययन से काम चलाना मुश्किल है। पर हाँ, हर खण्ड में कुछ अध्याय चुनकर उन्हें अधिक बेहतर ढंग से तैयार कर सकते हैं।
-चूँकि अब प्रश्नों की संख्या ज़्यादा होती है और शब्दसीमा कम, इसलिए पूरे पाठ्यक्रम की थोड़ी-थोड़ी जानकारी और समझ अवश्य रखें। हर टॉपिक को संक्षेप में तैयार कर लें।
पाठ्यक्रम- प्रश्नपत्र-1
खण्ड 'क' - हिन्दी भाषा और नागरी लिपि का इतिहास
खण्ड 'ख'- हिन्दी साहित्य का इतिहास
प्रश्नपत्र-2
खण्ड 'क'- पद्य साहित्य
खण्ड 'ख'- गद्य साहित्य
-प्रश्नपत्र-1 के खण्ड 'ख' (हिन्दी साहित्य का इतिहास) को ढंग से तैयार कर लें। यह प्रश्नपत्र-2 में भी काम आएगा। हिन्दी साहित्य का विकास किस तरह हुआ, इसे क्रमबद्ध तरीके से मोटे तौर पर समझ लें।
-विभिन्न लेखकों और कवियों के कथन और काव्य पंक्तियाँ दोनों प्रश्नपत्रों, विशेषकर द्वितीय प्रश्नपत्र में विशेष महत्त्व रखती हैं। उदाहरण देने से आपके कथन और तर्कों की पुष्टि हो जाती है। इसलिए प्रसंग के अनुरूप उदाहरण लिखने में हिचकिचाएं नहीं। पर ध्यान दें, उदाहरण प्रासंगिक और संगत लगने चाहिएं, ऊपर से थोपे हुए नहीं।
-आपने इन कोटेशन्स को जहां भी नोट किया है, (बेहतर होगा कि एक डायरी बना लें), वहां से इन्हें निरंतर दोहराते रहें। पर साथ ही हर पंक्ति के साथ उसका प्रसंग या प्रतिपाद्य जरूर लिख लें। मसलन, 'कबीर की भाषा' के बारे में लिखते हुए 'संस्किरत है कूप जल, भाखा बहता नीर' लिख सकते हैं। 'काहे री नलनी, तू कुम्हिलानी' से 'कबीर के दर्शन और रहस्यवाद' को जोड़ लें। 'किलकत कान्ह घुटरुवनि आवत', 'सूर के वात्सल्य' का अच्छा उदाहरण है। 'समन्वय उनका करे समस्त, विजयिनी मानवता हो जाय', 'कामायनी के समरसता के दर्शन' को प्रतिपादित करती हैं।  
-भाषा खंड को लेकर अभ्यर्थियों में एक अजीब सा भय रहता है। दरअसल यह खंड कम मेहनत में अधिक अंक देता है। इसकी सभी यूनिट्स को संक्षेप में तैयार कर लें। मसलन पाली, प्राकृत और अपभ्रंश में से प्रत्येक की अगर आपको 6-7 विशेषतायें पता हैं तो इतना काफी है। राजभाषा, राष्ट्रभाषा, संपर्क भाषा को ठीक से तैयार करना बेहतर विकल्प है।
-व्याकरणिक अशुद्धियों से बचने का अभ्यास।  सहज व सरल भाषा का प्रयोग। अभ्यास करना ज़रूरी, धीरे-धीरे लेखन कौशल विकसित होता जाएगा।
क्या पढ़ें और क्या नहीं-
-पाठ्यक्रम में निर्धारित सारी मूल टेक्स्ट बुक्स =,
- NCERT 11th class- साहित्य शास्त्र परिचय
- हिन्दी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास- डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी,
- हिन्दी साहित्य का इतिहास- डॉ नगेन्द्र
-हिन्दी भाषा- डॉ हरदेव बाहरी,
- छायावाद- डॉ नामवर सिंह
-कबीर- हजारी प्रसाद द्विवेदी
-कविता के नए प्रतिमान- नामवर सिंह
-हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास- डॉ रामस्वरूप चतुर्वेदी
-किसी अच्छी कोचिंग के नोट्स देख लें।
-यदि रुचि हो तो एक साहित्यिक पत्रिका जैसे 'आजकल', या 'नया ज्ञानोदय' पढ़ सकते हैं। अच्छा लगेगा और साहित्य की नवीनतम प्रवृत्तियों के प्रति भी सहज हो पाएंगे।
उत्तर कैसे लिखें-
-समग्रता और संश्लिष्टता
-क्रमबद्ध और व्यवस्थित
-कथन की पुष्टि हेतु यथासम्भव उदाहरण देना न भूलें,
- अगर पूरी कोटेशन याद न आए, तो सिंगल इनवर्टिड कोमा लगाकर आधी या चौथाई कोटेशन भी लिख सकते हैं।
-पैराग्राफ बनाकर लिखें, बुलेट पॉइंट नहीं।
- साफ-सुथरा और व्याकरणिक दृष्टि से सही लिखने की कोशिश करें।
-यदि चाहें तो महत्वपूर्ण बातों को अंडरलाइन कर सकते हैं।
रिवीजन कैसे करें - 
-रिवीजन अनिवार्य
-पाठ्यक्रम पूरा होने के बाद उसे एक-दो बार जरूर दोहरा लें,
-एक डायरी में यह नोट कर लें कि आपने पाठ्यक्रम का कौन सा हिस्सा कहां से पढ़ा है। दोहराते वक़्त काम आएगा।
-परीक्षा से एक दिन पहले दोहराने के लिए कुछ अति महत्वपूर्ण संक्षिप्त पॉइंट्स भी तैयार कर लें।
- फुर्सत में या मौका मिलने पर मूल टेक्स्ट बुक्स को यूं ही पढ़ते रहें।
-परीक्षा के पूर्व अनावश्यक विस्तार से बचते हुए पूरे पाठ्यक्रम को संक्षेप में दोहरा लें।
परीक्षा हॉल में कैसे अच्छा प्रदर्शन करें-
-
-कोशिश करें कि प्रश्नपत्र को क्रमवार हल करते चलें।  क्योंकि परीक्षक भी स्वाभाविक रूप से उसी क्रम में कॉपी जांचेंगे।
-हिन्दी के पेपर में जीएस की तरह वक़्त की उतनी कमी नहीं होती, अतः पूरा प्रश्नपत्र हल करने का प्रयास करें।
-यदि मैं अपनी बात करूँ, तो मुझे प्रथम प्रश्नपत्र में भाषा खंड और द्वितीय प्रश्नपत्र में काव्य खंड अधिक प्रिय हैं। और मैंने इन्हीं से अधिक प्रश्न हल किये थे। आप भी मन में विचार कर लें कि कौन से खण्डों से ज़्यादा प्रश्न हल करने हैं।
-हिंदी साहित्य के उत्तर पैराग्राफ में ही लिखें, बिन्दुवार नहीं।

-सहज और सरल भाषा का प्रयोग बेहतर है, पर ज़रूरत पड़ने पर साहित्यिक शब्दावली का प्रयोग करने में कतई न हिचकिचाएं।
------ निशान्त जैन 

अस्त-व्यस्त नहीं, व्यस्त और मस्त रहें...

अस्त-व्यस्त नहीं, व्यस्त और मस्त रहें...

एक हैं श्रीमान 'क'। सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के प्रति पूर्ण समर्पित। निष्ठा और समर्पण में कोई कमी नहीं। सोने और खाने के लिए कुछ समय बमुश्किल निकालकर, बाक़ी समय बस पढ़ते हैं। इतना पढ़ते हैं कि अड़ोस-पड़ोस के साथी इनसे लगभग भयाक्रांत रहते हैं। लिखते भी ठीक-ठाक हैं और स्मरण शक्ति भी बढ़िया है। सिलेबस भी पूरा तैयार है। इनके रूम पर इतनी किताबें और नोट्स का अंबार है, कि आप देखने मात्र से ही तनाव में आ जाएँ।
पर आश्चर्यजनक रूप से पिछले काफ़ी समय से परीक्षाओं में अपेक्षित सफलता नहीं मिल पा रही है। नतीजा हर बार सिफ़र।
उनके क़रीबी दोस्त बताते हैं कि वे इतनी मेहनत के बावजूद अनियमित और बेतरतीब दिनचर्या के शिकार हैं और विशेषकर परीक्षा के दिनों बेहद तनाव और दुश्चिंता से ग्रस्त हो जाते हैं।

दूसरे हैं श्रीमान 'ख'। जीवन कुछ हद तक व्यवस्थित सा है इनका। अक्सर व्यस्त रहते हैं। पढ़ाई भी जमकर करते हैं और कभी-कभार मस्ती भी। दोस्तों के भी पसंदीदा साथी हैं श्री ख। टाइम मैनेजमेंट ऐसा कि थोड़ा-बहुत वक़्त अपनी रूचियों के लिए भी निकाल ही लेते हैं। जब भी आप इनसे मिलेंगे तो इनके चेहरे पर एक मंद मुस्कान तैरती हुई मिलेगी। परीक्षा के दिनों में अतिरिक्त तनाव इनके लिए अजीब सी बात है और ये जनाब अपने चिरपरिचित शांत स्वभाव को परीक्षाओं में भी क़ायम रखते हैं। इनके बारे में एक और दिलचस्प बात यह है कि जितना इनपुट ये देते हैं, उससे ज़्यादा इनका आउटपुट रहता है। ये महोदय श्रीमान क जितना तो नहीं पढ़ पाते, पर जितना पढ़ते हैं, व्यवस्थित और नियमित ढंग से, वो भी रिवीज़न के साथ।

प्रिय दोस्तों, हमारे आस-पास श्रीमान 'क' और श्रीमान 'ख' जैसे तमाम साथी मिल जाएँगे। हो सकता है कि आप में से भी कई साथियों के लक्षण श्रीमान 'क' या श्रीमान 'ख' से मिलते-जुलते हों। इसी बीच मैं आपसे एक सवाल भी पूछना चाहता हूँ, जिसका ईमानदार जवाब आपको ख़ुद को ही देना है।
क्या आपके साथ भी ऐसी ही समस्या है कि आप मेहनत तो ख़ूब करते हैं, पर नतीजे नहीं मिल पाते। तैयारी भरपूर है पर इतनी अव्यवस्थित है कि आपको ख़ुद नहीं मालूम कि मैंने फ़लाँ टॉपिक कितनी किताबों से या किन-किन स्त्रोतों से पढ़ा है? क्या आपको कभी-कभी ऐसा लगता है, मेरा अमुक साथी जो मुझसे कम पढ़ता था, वह परीक्षा में सफल कैसे हो गया? या मैंने जिसे पढ़ाया, वही मुझे पीछे छोड़कर ख़ुद चयनित हो गया? क्या आपको ऐसा लगता है कि जितनी पढ़ाई मैंने की, उसके अनुरूप मुझे कभी परिणाम मिला ही नहीं। या फिर यह महसूस हुआ हो कि मेरी तैयारी में ऐसी कौन सी कमी है कि सफलता मेरे पास आकर भी दूर छिटक जाती है?
अगर आपको ये सारे सवाल या इनमें से कुछ सवाल भी मथते हैं तो आपको निश्चित रूप से आत्ममंथन कर लेना चाहिए। हो सकता है कि आपकी स्थिति श्रीमान 'क' से मिलती-जुलती हो। हो सकता है कि आप अस्त-व्यस्त तरीक़े से तैयारी करते हों और अस्त-व्यस्त तरीक़े से ही उसे परीक्षा में लिखकर आते हों। 
साथियों, आप यह बात समझ रहे होंगे कि दरअसल हमें श्रीमान 'क' से श्रीमान 'ख' तक की यात्रा तय करनी है। सफलता की राह को जटिल न बनाकर उसे सरल और सहज बनाते हुए सफलता की सम्भावना को बढ़ाना है और आगे बढ़ते जाना है।
आपने समझा कि 'अस्त-व्यस्त' तरीक़े से पढ़ाई और तैयारी के क्या-क्या साइड इफ़ेक्ट होते है? जबकि हमारे ही बीच कुछ साथी व्यस्त और मस्त रहकर अपेक्षाकृत कम तैयारी के बावजूद बेहतर नतीजे हासिल कर लेते हैं।
आइए, चर्चा करते हैं कि ऐसा क्यों होता है। दरअसल 'व्यस्त' रहना एक बात है, और 'अस्त-व्यस्त' रहना दूसरी बात। सफल होने और साथ ही ख़ुश रहने के लिए, व्यस्त रहना निश्चय ही ज़रूरी है, पर अस्त-व्यस्त तरीक़े से व्यस्त रहना क़तई ज़रूरी नहीं है। इसके बजाय मस्त रहते हुए व्यस्त रहना कई गुना बेहतर है। मस्त और व्यस्त रहने का सीधा सा फ़ायदा यह होता है कि आप व्यर्थ के तनाव से बचे रहते हैं और परीक्षा में भी शांत और सहज मन से बेहतर प्रदर्शन कर पाते हैं। 
आइए, जानें, 'व्यस्त और मस्त' रहने के फ़ायदे-
-आप अमूमन प्रसन्न रहते हैं और आपमें सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बना रहता है।
- आप जो भी पढ़ते हैं, उसे एंजॉय करते हैं और तनावपूर्ण समय में भी सहज रहते हैं।
- सहज और शांत रहने की इस आदत के चलते आप परीक्षा हॉल में भी आपका प्रदर्शन औसत से बेहतर रहता है, क्योंकि आप दिमाग पर अनावश्यक भार रखे बिना खुलकर लिख पाते हैं।
- साथ ही साथ आप परीक्षा के परिणाम को लेकर ज़्यादा चिंतित भी नहीं होते और हर परिस्थिति के लिए तैयार रहते हैं। एक कहावत भी है- 'Try for the best, prepare for the worst.'

दरअसल व्यस्त रहना एक नियामत की तरह है। और अगर मस्त रहकर व्यस्त रहा जाय, तो यह सोने पर सुहागा ही है। व्यस्त रहने से आपको एक संतुष्टि का भाव महसूस होता है और आप अपने दिन को जस्टीफ़ाई कर पाते हैं।
पर आख़िर ऐसे कौन से तरीक़े हैं, जिनसे हम अपनी आदत में कुछ बदलाव लाते हुए बिज़ी रहते हुए भी ख़ुश रह सकते हैं।
- दिनचर्या को नियमित करने की कोशिश करें। 'परफ़ेक्ट' दिनचर्या जैसी कोई चीज़ नहीं होती। जहाँ तक सम्भव हो, एक ठीक-ठाक दिनचर्या बनाकर उसका पालन करने की कोशिश करें।
- अस्त-व्यस्त और अव्यवस्थित रहने की आदत से धीरे-धीरे छुटकारा पाएँ। जैसे कि आप स्टडी का एक शेड्यूल बना लें, जिसमें पढ़ाई के साथ-साथ अभ्यास, रिवीज़न और लेखन का भी समुचित स्थान हो।
- अपने स्वत्व और सहजता को बनाए रखें। अपने शौक़ व रूचियों और फ़िटनेस व हाईजीन का भी ख़याल रखें। अपनी दिनचर्या में योग व प्राणायाम को शामिल करने का प्रयास करें।
- व्यस्त रहना आपको शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ बनाए रखता है। पर साथ ही प्रसन्नचित्त और मस्त रहकर पढ़ाई करने का अपना हो आनंद है।
- स्वयं ख़ुश रहें, तभी आप दूसरों को भी ख़ुश कर सकते हैं। प्रसन्नता संक्रामक होती है। भीतर से ख़ुश रहें और बाहर भी ख़ुश दिखें। 
शुभकामनाओं सहित-
निशान्त 
(लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं।)



















Saturday, 31 December 2016

नए साल के नए संकल्प... (New Year Resolutions: my perspective)

नए साल के नए संकल्प...
New Year Resolutions....


जिस तरह हर नई सुबह पिछले दिन के तनावों और अवसादों से मुक्त एक नई शुरुआत की उम्मीद लेकर आती है, उसी तरह नया साल भी ख़ुद में नई ऊर्जा, नई उम्मीदों और नई आकांक्षाओं को समेटे हुए आता है। 
अख़बार-टी.वी.-सोशल मीडिया, सब ओर न्यू ईयर रिज़ोल्यूशन की बाढ़ आ जाती है। हम भी इसी उत्साह में कुछ पुरानी आदतों से छुटकारा पाने और नई आदतों को गले लगाने का संकल्प करते हैं, ताकि हम भी इस नए साल में किसी से पीछे न छूट जाएँ। साथ ही, ये संकल्प करते वक़्त ऐसा लगता है कि हम नए साल के पहले दिन से ही यकायक इन सारे नए संकल्पों का अक्षरश: पालन करना शुरू कर देंगे। यह उम्मीद तो होती है, कि नए साल में पुरानी पीड़ाओं और मुसीबतों से छुटकारा मिलेगा, और जीवन में सफलता व ख़ुशियों का नव उत्कर्ष भी होगा।
किसी कवि ने नए वर्ष पर बहुत ख़ूब लिखा भी-
"'सुखों की कल्पनाएँ हैं, सृजन के गीत लाए हैं,
तुम्हारे वास्ते मन में, बहुत शुभकामनाएँ हैं,
तुम्हारी ज़िन्दगी में कल न कोई पल घटे ऐसा,
उदासी में जो पल पिछले दिनों तुमने बिताए हैं।''

क्या कभी आपने यह भी सोचा है कि पिछले साल नववर्ष के अवसर पर आपने जो संकल्प (resolutions) लिए थे, उनकी प्रगति रिपोर्ट क्या है? मतलब उनमें से कितने संकल्प व्यवहार में परिणत हुए और कितने ठंडे बस्ते में चले गए। जिस तरह रेल बजट में हर साल नई-नई रेलगाड़ियों की घोषणा की ही तरह,  पिछले बजटों में घोषित रेलगाड़ियों का समयबद्ध संचालन भी ज़रूरी है; उसी तरह नए साल पर नए संकल्प संजोने के साथ-साथ पुराने सालों के पुराने से पड़ गए संकल्पों को व्यावहारिक धरातल पर उतरना भी। बशर्ते वे पुराने संकल्प अब भी काम के हों और प्रासंगिक भी हों।

चाहे आप पुराने संकल्प व्यवहार में उतार पाएँ या नहीं, पर फिर भी नया वर्ष नए संकल्पों का उत्साह साथ लाता ही है। लिहाज़ा नए साल में नए संकल्पों के बारे में सोचना बेहद स्वाभाविक भी है और आपकी जीवंतता का प्रतीक भी। मैं भी पिछले कई सालों से न्यू ईयर रेजोल्यूशन लेता रहा हूँ और इस बार भी लूँगा। अंतर बस इतना ही होता है, कि हर साल हमारी प्राथमिकतायें और ज़रूरतें बदलती जाती हैं।
आइए, बात करते हैं 10 ऐसे संकल्पों की, जो हर युवा अभ्यर्थी के लिए प्रेरक हो सकते हैं, और जिन्हें व्यवहार में उतारना ज़्यादा मुश्किल भी नहीं है:-
  1. जीवन में 'निरंतरता' को अपनाने की कोशिश करें। कोई अच्छा काम या अच्छी आदत शुरू करके उसे जारी रखना भी सीखें।
  2. हल्की सी मुस्कान हमेशा बनाए रखें। इससे आपको मुसीबत का सामना करने और नित आगे बढ़ते जाने में मदद मिलेगी। 'Never Never Never Give up'
  3. आज की ख़ुशी को आज ही enjoy करना सीखें। ख़ुशियों को कल पर न टालें। वर्तमान में जीने की आदत  डालें, अतीत से सीखते रहें और भविष्य की दिशा में क़दम बढ़ाते जाएँ।
  4. छोटे-छोटे लक्ष्य बनाए और उनके पूरा होने पर मिलने वाली ख़ुशियों को महसूस करें। इन छोटी-छोटी ख़ुशियों को सेलिब्रेट करना न भूलें।
  5. नए साल में दूसरों के विचारों का सम्मान करने की आदत विकसित करें। 'अनेकांतवाद' से उपजे धैर्य और सहिष्णुता जैसे गुण आपके व्यक्तित्व की मेच्योरिटी को बढ़ाएँगे। विचारों की अति (extreme) से बचते हुए 'मध्यम मार्ग' अपनाएँ।
  6. भरपूर पुरुषार्थ करें पर फल (परिणाम) को लेकर बहुत ज़्यादा चिंतित न हों। नतीजों में आसक्त (attach) न होकर 'निष्काम कर्मयोग' को विकसित करने का अभ्यास करें।
  7. नए दोस्त बनाएँ पर पुराने रिश्तों को भी निभाना सीखें। 'लाख मुश्किल ज़माने में है, रिश्ता तो बस निभाने में है।' परिवार और दोस्तों के साथ 'क्वालिटी टाइम' बिताएँ।
  8. एक-दूसरे के काम आएँ और परस्पर सहयोग की आदत विकसित करें। तत्वार्थ सूत्र में लिखा भी है- 'परस्परोपग्रहो जीवानाम'
  9. कोशिश करें कि किसी ज़रूरतमंद की मदद कर पाएँ। 'Joy of Giving' यानी देने के सुख का कोई मुक़ाबला नहीं है। किसी के चेहरे पर मुस्कान लाने पर आपको जो संतोष मिलेगा, वह अतुल्य है। मिसाल के तौर पर, वक़्त मिलने पर वंचित बच्चों को पढ़ाना उनके जीवन में बदलाव ला सकता है।
  10. अपनी रूचियों/शौक़/ हॉबीज़ को जिएँ। हमेशा कुछ नया सीखने की ललक बनाए रखें। सीखने में हिचकिचाएँ नहीं और श्रेष्ठ विचारों को सभी दिशाओं से आने दें। ऋग्वेद में लिखा भी है- 'आ नो भद्रा क्रतवो यंतु विश्वत:।'
ये उपर्युक्त दस संकल्प रातोंरात विकसित नहीं होंगे। मैं भी निरंतर इनका अभ्यास करता हूँ। आप भी इन्हें प्रैक्टिस में लाएँ, फिर देखिए, आपका जीवन कितना ऊर्जावान, सुखमय और सहज होता जाएगा।
अंत में इसी सकारात्मकता से भरपूर मेरी एक कविता, जो UPSC परीक्षा की तैयारी के दिनों में मैंने नववर्ष की पूर्व संध्या पर लिखी थी:-
सकारात्मक सोच -

सकारात्मक सोच संग उत्साह और उल्लास लिए,
जीतेंगे हर हारी बाज़ीमन में यह विश्वास लिए। 

ऊहापोह-अटकलें-उलझनेंअवसादों का कर अवसान,
हों बाधाएं कितनी पथ मेंचेहरों पर बस हो मुस्कान। 

अंतर्मन में भरी हो ऊर्जानई शक्ति का हो संचार,
डटकरचुनौतियों से लड़करजीतेंगे सारा संसार। 

लें संकल्प सृजन का मन मेंउम्मीदों से हो भरपूर,
धुन के पक्के उस राही सेमंज़िल है फिर कितनी दूर। 

जगें ज्ञान और प्रेम धरा परगूंजे कुछ ऐसा सन्देश,
नई चेतना से जागृत होसुप्त पड़ा यह मेरा देश। 

आप सबको नववर्ष 2017 की ढेर सारी मंगल शुभकामनाएँ!!!
Happy New Year🌾🍃🌲☘🎈🎉✨🎁




Saturday, 24 December 2016

'दंगल'- म्हारी छोरियाँ छोरों से कम हैं के?

'दंगल' : म्हारी छोरियाँ छोरों से कम हैं के? 

खेल का मतलब सिर्फ़ क्रिकेट से लेने वाले करोड़ों भारतीयों को इतनी देर तक कुश्ती के मैच दिखाना और उसके नियम-क़ायदे तक सिखा देना आमिर खान के बस की ही बात है। हरियाणा जैसे सूबे में अपनी बेटियों को पहलवान बनाने का सपना देखना और उसे दिन-रात जीना कोई महावीर सिंह फोगट से ही सीखे। 
मेरी समझ में इस बेहतरीन मूवी के क्या-क्या निहितार्थ हैं और क्या-क्या सीखना हमारे लिए भी काम का हो सकता है, आइए जानें :-
  1. किसी भी बड़ी चाहत को सच करने के लिए थोड़ा जुनून तो चाहिए ही। कुछ पाने के लिए काफ़ी कुछ खोना भी पड़ता है। याद है ना, जयशंकर प्रसाद ने भी लिखा है-"महत्वाकांक्षा का मोती निष्ठुरता की सीप में पलता है।"
  2. जीवन में थोड़ी सी सफलता आगे बड़ी सफलताओं का रास्ता खोल सकती है, बशर्ते आप बौखलाए बग़ैर सहज रहें। गीता-बबीता फोगट के पिता एक संवाद में कहते भी है, "बस एक बात कभी मत भूलना कि तू यहाँ तक पहुँची कैसे?"
  3. लोगों की फ़िज़ूल की बातों के चक्कर में पड़ने वाले लम्बी रेस के घोड़े नहीं बन पाते। इधर-उधर की नकारात्मक बातें बनाने वाले कम नहीं, पर उन्हीं के बीच आपकी मदद करने को तत्पर लोग भी मिल ही जाते हैं।
  4. गीता को ट्रेनिंग देने वाले तथाकथित इंटरनेशनल लेवल के कोच का कैरेक्टर भी बहुत कुछ सिखाता है। झूठा श्रेय लेने, आपको निरंतर हतोत्साहित करने और झूठी ईगो में जीने वाला व्यक्ति आपको तंग करने की ख़ातिर किसी भी हद तक जा सकता है। ऐसे में रहीम के एक दोहे में इस समस्या का समाधान भी छिपा है-
         "रहिमान ओछे नरन सों, बैर भली न प्रीत,
          काटे-चाटे स्वान के, दोऊं भाँति विपरीत।"
         कुल मिलाकर ऐसे लोगों से एक सुरक्षित दूरी बनाए रखना ही बेहतर है।
     5- आख़िरी और बेहद ज़रूरी बात- 'कभी भी अपने व्यक्तित्व की मौलिकता न खोयें'। सहवाग हैं तो सहवाग ही रहें, द्रविड़ बनने के चक्कर में अपने भीतर के 'सहवाग' को अनदेखा न करें। कहने का मतलब है कि नया ज़रूर सीखें, पर अपने 'स्वत्च' या मूल स्वरूप को खोने की क़ीमत पर नहीं। मैंने कहीं पढ़ा था:
"ना किसी के 'अभाव' में जियो, ना किसी के 'प्रभाव' में जियो,
ये ज़िंदगी है आपकी, इसे अपने 'स्वभाव' में जियो।"
(यह कोई टिपिकल फ़िल्म समीक्षा नहीं है। वैसे अगर इसे मूवी देखने के बाद पढ़ने वाला ज़्यादा एप्रिशियेट कर पाएँगे।)







Friday, 2 December 2016

परस्परोपग्रहो जीवानाम

ज़िंदगी की राह बहुत सारे उतार-चढ़ावों और सम-विषम परिस्थितियों से भरी है। आप बेहतरी के लिए जो भी प्रयास करते हैं, उनमें कोई न कोई बाधा आती ही है। कभी-कभी आप महसूस करते हैं कि मुश्किल वक़्त में किसी दोस्त या सम्बंधी की मदद से आप उस परेशानी का सामना कर पाए और फिर से आपने ज़िंदगी की लय पकड़ ली। आप यह भी महसूस करते हैं कि अगर इस वक़्त में कोई अपना या कोई अच्छा दोस्त आपका साथ देता तो शायद आप उस मुसीबत से जल्दी और आसानी से निकल जाते।
कभी-कभी हम यह भी पाते हैं कि ज्ञान और अनुभव का महासागर अनंत और विराट है और हम सबने अभी मुश्किल से इस सागर में एक-एक डुबकी ही लगाई है। अतः किसी एक इंसान के लिए इस विराट सागर की थाह पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। शायद इसीलिए प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात ने एक बार कहा था- 'मैं सबसे ज़्यादा ज्ञानी इस अर्थ में हूँ कि मैं ये जानता हूँ कि मैं कुछ भी नहीं जानता।' यानी सुकरात को अपनी अल्पज्ञता और अकिंचनता का बोध हो गया था और वे इस बात को महसूस कर चुके थे कि उन्होंने इस विराट महासागर की एक बूँद ही चखी है।
लिहाज़ा हम भी सुकरात जितने ज्ञानी भले ही न हों, पर हम यह महसूस तो करते ही हैं कि हम ज्ञान और अनुभव के इस विराट महासागर की थाह अकेले अपने दम पर नहीं पा सकते। हम इतना समझते हैं कि हमारी जानकारी और समझ का दायरा सीमित है और देश-काल-परिस्थितियों की कुछ सीमाएँ हैं, जिनके चलते हम कभी भी सब कुछ नहीं जान सकते। यहाँ यह भी समझना ज़रूरी है कि न तो इस जगत में सर्वज्ञ बनना सम्भव है और न ही वांछनीय।
इस सम्बंध में जैन दर्शन के आचार्य उमास्वामी ने 'तत्वार्थ सूत्र' में एक सूत्र लिखा था- 'परस्परोपग्रहो जीवानाम।' इसका अभिप्राय है कि 'इस जगत में प्राणी एक दूसरे के सहयोग से लाभान्वित होते हैं।' (Living beings benefit by helping each other.) यह सूत्र सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी की प्रक्रिया में भी उतना ही काम आ सकता है जितना आम ज़िंदगी जीते हुए।
अक्सर तैयारी के दौरान हम सोचते हैं कि हमें जो पता है, वो किसी को नहीं पता और हमें अपना ज्ञान और अनुभव सबसे छिपाकर रखना चाहिए। कुछ लोग यहाँ तक भी सोचते हैं, कि अगर मैंने अपने विचार/नोट्स/किताब/रणनीति किसी दोस्त या सहपाठी से साझा कर ली, तो कहीं उसके अंक मुझसे ज़्यादा न आ जाएँ। अगर किसी ने मेरे ज्ञान का फ़ायदा उठा लिया और वह मुझसे पहले परीक्षा में सफल हो गया, तो क्या होगा?
प्रिय दोस्तों, यह सोच एक संकुचित सोच है, जो आपको आगे बढ़ाने के स्थान पर पीछे की ओर धकेलती है। इस तरह की सोच से न तो आपका कोई भला होने वाला है और न ही किसी और का। वास्तविकता तो यह है कि सिविल सेवा परीक्षा की प्रकृति कुछ ऐसी है कि इसमें प्रत्येक अभ्यर्थी के अंक उसके अपने अध्ययन और कौशल के आधार पर आते हैं, न कि महज़ किसी का अनुकरण करने से।
बल्कि मैं तो यह कहूँगा कि इस प्रतिष्ठित परीक्षा के नवीनतम पैटर्न में 'परस्परोपग्रहो जीवानाम' का सूत्र बहुत काम का है और आपकी तैयारी को अधिक व्यापक, डायनमिक और समग्र बना सकता है। अगर किसी टॉपिक विशेष पर आप बेहतर जानते हैं और किसी अन्य टॉपिक पर आपके किसी साथी की समझ अच्छी है, तो आप दोनों मिलकर एक-दूसरे के सहयोग से लाभान्वित हो सकते हैं। 'ग्रुप डिस्कशन' इसका एक बेहतरीन तरीक़ा है। ग्रुप डिस्कशन से ज्ञान और समझ तो बढ़ती ही है, साथ ही बोलने और सुनने का कौशल भी विकसित होता है। इस तरह सिविल सेवा परीक्षा में आप अपेक्षाकृत फ़ायदे की स्थिति में होते हैं।
शास्त्र कहते हैं कि 'विद्या ही एकमात्र ऐसा धन है, जो बाँटने पर बढ़ता है।' यह एक बहुत दिलचस्प बात है। मैंने तैयारी के दौरान बहुत बार यह महसूस किया कि मैं अपने पढ़ी हुई विषयवस्तु को किसी अन्य अभ्यर्थी के साथ बाँट पाऊँ। मनोविज्ञान भी मानता है कि अगर हम अपना ज्ञान किसी से शेयर करते हैं, तो हम उस ज्ञान को लम्बे समय तक मस्तिष्क में स्टोर कर पाते हैं। किसी से कुछ सुनना और किसी को कुछ सुनाना, दोनों ही चीज़ों को याद रखने में मदद करते हैं। साथ ही, पढ़ा हुआ या सीखा हुआ ज्ञान शेयर करने से हमें भी उसके नए आयाम पता चलते हैं, जो शायद हमने पहले सोचे भी नहीं थे। इंग्लिश की एक कहावत भी है-
"Tell me and I forget,
Teach me and I remember,
Involve me and I learn."
'तत्वार्थ सूत्र' का यह सूत्र पढ़ाई में ही नहीं, तैयारी की लम्बी और थकाऊ प्रक्रिया की बाक़ी जटिलताओं में भी आपके काम आता है और आपका मनोबल भी बढ़ाता है। मिसाल के तौर पर, मैं अपने कुछ ऐसे साथियों को जानता हूँ, जो इस तैयारी के दौरान मिलने वाली असफलताओं या तनावों से बहुत प्रभावित हो गए और लगभग अवसाद या डिप्रेशन जैसी हालत में पहुँच गए। ज़िंदगी की दौड़ में अकेले आगे बढ़ने में कोई बुराई भी नहीं है, पर नितांत एकाकी हो जाना कभी-कभी समस्या का कारण बन जाता है। आप अपनी चिन्ताएँ/ तनाव/परेशानियाँ/ ख़ुशियाँ/ मस्तियाँ यदि कभी किसी से साझा नहीं करते, तो आप भीतर ही घुटने लगते हैं और यह स्थिति कभी-कभी जब ज़्यादा बढ़ जाती है, तो मनोविकारों में परिणत हो जाती है। जबकि यदि आप एक-दूसरे का सहयोग करते हुए, हँसते-मुस्कुराते, आगे बढ़ते हैं, तो ज़रूरत या तनाव की स्थिति में आपका साथ देने के लिए आपके परिजन, दोस्त और सहपाठी आपके साथ होते हैं। मत भूलिए कि महाबली हनुमान को भी उनकी भूली-बिसरी शक्तियाँ याद दिलाने के लिए जाम्बवंत को 'का चुप साधि रहा बलवाना' कहना पड़ा था।
साथ-साथ क़दम बढ़ाना का यह संदेश हमारे वेदों में भी दिया गया है-
'सं गच्छ्ध्वम सं वदध्वम सं वो मनांसि जानताम।'
यानी साथ-साथ चलो, साथ-साथ बोलो और साथ-साथ एक दूसरे के मन को समझो। इसका अर्थ यदि थोड़ी गहराई से समझें, तो हम जान पाएँगे कि ज़िंदगी की राह में हमारा एक-दूसरा का साथ देना या एक-दूसरे के काम आना कितना ज़रूरी है। विशेषकर, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में तो यह बहुत उपयोगी है। एक-दूसरे से अपना ज्ञान-अनुभव-समझ-कौशल बाँटने से ये सभी बढ़ते ही हैं, घटने का तो कोई सवाल ही नहीं है।
किसकी मदद की कब ज़रूरत पड़ जाए, या कौन कब आपके काम आ जाए, इसका कुछ पता नहीं। कभी-कभी तो किसी परीक्षा या अवसर की जानकारी हमें किसी और से ही होती है। इसी तरह कभी-कभी हम किसी की मदद से ही तैयारी की सही दिशा और गति पकड़ पाते हैं। दोस्तों, 'बूँद-बूँद से ही सागर भरता है। एक-दूसरे के सहयोग से एक परस्पर प्रेम और सौहार्द का अद्भुत वातावरण बनाएँ और ज्ञान व सूचना की नवीन क्रांति
से लाभान्वित हों।
शुभकामनाएँ!!!

Tuesday, 29 November 2016

परफ़ेक्शन को कहें 'ना'....

भारतीय संविधान में अनुच्छेद 51(क) में उल्लिखित मूल कर्तव्यों में से एक कर्तव्य है-
"व्यक्तिगत  और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करना, जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊँचाइयों को छू ले।"
यानी इसमें कोई भी संदेह नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने निजी और सार्वजनिक जीवन में बेहतरी की ओर बढ़ने का प्रयास करते रहना चाहिए और जीवन में उत्कृष्टता की उपलब्धि करने में कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए। हम अपने आस-पास के माहौल में यह भी निरंतर देखते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति यथासंभव कुछ न कुछ प्रयास करके ऊँचाई को छूने की कोशिश करता ही है। एक किसान चाहता है कि अगली बार वह बेहतर पद्धतियों और संसाधनों का प्रयोग कर पहले से ज़्यादा और गुणवत्तापूर्ण फ़सल उगा सके, व्यापारी चाहता है कि उसके ग्राहक बढ़ते जाएँ और बैलेंस शीत शिखर को छू जाए, नौकरीपेशा कर्मचारी का ख़्वाब है कि उसका लम्बित प्रमोशन जल्दी से जल्दी हो और उसके वेतन ग्रेड में आशातीत बढ़ोतरी हो जाए। इसी तरह किसी भी परीक्षार्थी का इस दिशा में भरपूर प्रयास है कि वह परीक्षा में सफलता के लिए वांछित सभी चरणों में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर अपने सपनों को साकार कर ले।
उत्कृष्टता और बेहतरी की यह चाहत स्वाभाविक है और यह जीवन की सार्थकता की ओर ले जाने में निश्चय ही सहायक होती है। अंग्रेज़ी के कवि RW Emerson ने इसीलिए युवाओं के विषय में इसीलिए लिखा भी है-
"Brave men who work while others sleep,
Who dare while others fly,
They build a nation's pillars deep,
And lift them to the sky."

पर कभी-कभी आगे बढ़ने और लक्ष्य प्राप्त करने की यह एक जुनून या फिर उससे भी ज़्यादा एक फ़ितूर का रूप लेने लगती है। कुछ साथियों को ऐसा लगने लगता है कि यदि उन्हें यूपीएससी की इस प्रतिष्ठित और सर्वोच्च मानी जाने वाली परीक्षा में सवाल होना है तो उन्हें हर काम परफ़ेक्शन के साथ करना होगा। इसी धुन में वह 'परफ़ेक्शनिस्ट' या 'अतिमानव' बनने की कोशिश करने लगते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि 'परफ़ेक्ट' जैसा कुछ भी नहीं होता और न ही इस परीक्षा या किसी भी परीक्षा में सफलता के लिए आपको परफ़ेक्ट बनने की दरकार है।
परफ़ेक्शनिस्ट बनने का यह आग्रह ही ख़ुद से एक ज़्यादती है। क्योंकि कोई भी चीज़ या कोई भी व्यक्ति स्वयं में पूर्ण या परफ़ेक्ट नहीं होता। एक कहावत भी है-
"There is no perfect way,
There are many good ways."
हममें से कोई भी अतिमानव या 'सुपरमैन' नहीं है और न ही ऐसा बनना वांछनीय है। ज़रूरत है तो सकारात्मक सोच के साथ, व्यापक व संतुलित नज़रिया अपना कर सही दिशा में निरंतर प्रयास करते जाने की, ताकि अभीष्ट लक्ष्य हासिल हो सके।
परफ़ेक्शन के इसी जुनून के चक्कर में कुछ अभ्यर्थी बहुत महत्वाकांक्षी और ग़ैर-व्यावहारिक योजनाएँ बनाते हैं। ये हवाई प्लान ज़मीन से कोसों दूर होने के कारण वास्तविकता में परिणत न तो होने थे और न ही हो पाते हैं। आपने अपने आस-पास ऐसे अभ्यर्थी ज़रूर देखे होंगे, जो प्लानिंग बहुत बड़ी-बड़ी करते हैं, पर लागू करने में बहुत पीछे रह जाते हैं।
कभी-कभी हम परीक्षा के तैयारी के दौरान हम परफ़ेक्ट बनना चाहते हैं और हर चीज़ को बेस्ट तरीक़े से करना चाहते हैं। जैसे- हमारा स्टडी मैटेरियल, कोचिंग, टेस्ट सिरीज़, रिवीज़न, नोट्स, दिनचर्या सभी कुछ सर्वश्रेष्ठ होना चाहिए, तभी हमारी
बेस्ट रैंक आएगी और हम UPSC टॉपर बनेंगे।
 इस तरह अतिशय भावुकता में हम बड़ी-बड़ी योजनाएँ और आदर्श दिनचर्या का शेड्यूल तो निर्मित कर लेते हैं, पर जब उनके क्रियान्वयन की बारी आती है तो शुरुआती उत्साह धीरे-धीरे ढीला पड़ने लगता है और हम अपने लक्ष्यों से पीछे होते जाते हैं, जिससे लक्ष्य लम्बित होने लगते हैं और एक के बाद एक बैकलॉग बढ़ता जाता है।
इस बैकलॉग का स्वाभाविक परिणाम धीरे-धीरे खीझ, कुंठा और तनाव के रूप में सामने आता है और हम नाहक ही परेशान और व्यग्र रहने लगते हैं। इस स्ट्रेस और व्यग्रता का असर हमारी पढ़ाई और तैयारी पर स्वाभाविक तौर पर पड़ता ही है और आदर्शवादी लक्ष्य पाना तो दूर, हम सामान्य से लक्ष्यों को पाने में ही ख़ुद को अक्षम पाने लगते हैं।
लाख टके का सवाल यह है कि अनावश्यक रूप से उपजी इस मुसीबत और नकारात्मकता से छुटकारा पाने के लिये हम पहले से ही क्या करें, क्या न करें और कैसे करें?
इस स्थिति से बचने के लिए बेहतर समाधान यह हो सकता है कि जब भी हम योजनाएँ या स्टडी प्लान बनाएँ तो उसमें अपनी क्षमता, सामयिक परिस्थितियाँ, अपने उद्देश्यों, अपनी महत्वाकांक्षा का स्तर और उपलब्ध समय आदि को ध्यान में रखते हुए प्लानिंग करें। यह प्लानिंग व्यावहारिकता और वास्तविकता के धरातल पर रहकर बनाएँ, न कि ख़ुद को 'सुपरमैन' समझकर। हर अभ्यर्थी की क्षमताएँ और अध्ययन व अभ्यास का स्तर व कौशल भिन्न-भिन्न होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति स्वयं में विशिष्ट होता है। किसी भी सफल व्यक्ति या टॉपर को ज्यों-का- त्यों कॉपी करने के चक्कर में अपने लिए अव्यावहारिक और कुछ हद तक 'असम्भव' योजनाएँ बनाना कहाँ की समझदारी है।
किसी सफल व्यक्ति से प्रेरणा लेना या उससे मार्गदर्शन लेना अच्छी बात है, पर अपने व्यक्तित्व और तैयारी के स्तर को अनदेखा करके 'परफ़ेक्शन' के पीछे भागना आपके लक्ष्यों को वास्तविकता से दूर ले जा सकता है। सिविल सेवा परीक्षा के दौरान कभी-कभी एक और उलझन होती है। हम हर महीने नए टॉपर का इंटरव्यू पढ़ते हैं और हर टॉपर से प्रभावित होते हैं। यह स्वाभाविक है और उससे प्रेरणा और मोटिवेशन लेने में कोई समस्या भी नहीं है। पर कभी-कभी हम किसी व्यक्ति या टॉपर को परफ़ेक्ट समझने के चक्कर में हम उसे आँख बंद करके उसका अनुकरण करने लगते हैं। मेरा यही आग्रह है कि 'प्रेरणा लें, पर अंधानुकरण न करें'।
यहाँ यह भी समझना ज़रूरी है कि टॉपरों और अभ्यर्थियों में कोई बहुत ज़्यादा फ़र्क़ नहीं होता। ज़्यादातर टॉपर सफलता के बाद ख़ुद स्वीकारते हैं कि उन्हें इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि वे ऐसा असाधारण प्रदर्शन करेंगे। कोई भी समझदार अभ्यर्थी सही तरीक़े से परिश्रम और पुरुषार्थ के द्वारा टॉपर बन सकता है।
 पर टॉपरों के इंटरव्यू पढ़कर कई अभ्यर्थी यह सोचकर कनफ़्यूज हो जाते हैं कि कौन सी रणनीति सर्वश्रेष्ठ है? कारण यह है कि हर टॉपर की पृष्ठभूमि, व्यक्तित्व और रणनीति अलग-अलग होती है। उदाहरण के तौर पर, किसी टॉपर ने किसी जॉब के साथ तैयारी की थी, किसी ने पढ़ाई करते-करते तैयारी की, तो कोई सब कुछ छोड़कर समर्पित रूप से तैयारी करके सफल हुआ। अब यदि हम सभी टॉपरों का एक साथ अनुकरण करने लगेंगे तो ऊहापोह होना तय है।
मैं आपसे यही कहूँगा कि आपके लिए वही रणनीति श्रेष्ठ है जो आपके व्यक्तित्व और अध्ययन-अनुभव-तैयारी के स्तर के अनुकूल हो। बस इतना सा करना है कि एक बेहतर और व्यावहारिक रणनीति बनाकर उसका क्रियान्वयन करें और सुधार की कोशिश हमेशा जारी रखें। छोटे-छोटे व्यावहारिक लक्ष्य बनाएँ और उन्हें धीरे-धीरे पूरा करते जाएँ और तनावमुक्त रहें।
'परफ़ेक्शन' का फ़ितूर न हो, पर सुधार (improvement) की उम्मीद और गुंजाइश हमेशा बनी रहनी चाहिए। हमें अपनी रणनीति और तैयारी के तरीक़े को लेकर इतना भी रक्षात्मक नहीं होना चाहिए कि हम ज़रूरत और प्रासंगिकता के मुताबिक़ समय-समय पर वांछनीय परिवर्तन और सुधार न कर सकें। ज़रूरत के मुताबिक़ ख़ुद को ढालने में हमेशा समझदारी होती है।
जब हम 'परफ़ेक्शन' पर बात कर ही रहे हैं तो हमें यह भी समझ लेना चाहिए, कि हम भले ही काल्पनिक 'परफ़ेक्शन' से दूर रहें, पर अपना 'बेस्ट' देने में भी कोई कसर न छोड़ें। अगर आप अपने लक्ष्य को लेकर गम्भीर हैं तो आप अपनी पूरी क्षमता और पूरे मनोयोग से तैयारी करें और अपना 'सर्वश्रेष्ठ' दें ताकि आप अपना 'सर्वश्रेष्ठ' प्रदर्शन कर वांछित परिणाम हासिल कर सकें। ये और बात है कि परिणाम आपके पक्ष में आए या नहीं पर कम से कम यह तसल्ली तो रहेगी कि मैंने अपना बेस्ट किया और अपनी कोशिशों में कोई कसर नहीं छोड़ी। यदि आपने पूरे मन और विश्वास से पुरुषार्थ करते हैं, तो आपकी सफलता कि सम्भावनाएँ कई गुना बढ़ जाती हैं।
अपने परिश्रम और अध्यवसाय की यात्रा को मस्ती के साथ एंजॉय करते हुए जब आप आगे बढ़ेंगे तो आपको महसूस होगा कि कभी-कभी 'सफ़र मंज़िल से भी ज़्यादा ख़ूबसूरत होता है।'
किसी शायर ने लिखा भी है-
'मंज़िल मिले या नहीं मुझे उसका ग़म नहीं,
मंज़िल की जुस्तज़ू में मेरा, कारवाँ तो है।'
अतः 'चरैवैति- चरैवेति' का मंत्र अपनाएँ और 'यूँ ही चला चल राही' की तर्ज़ पर अपना 'बेस्ट' देते हुए अपने सपनों की राह पर सही दिशा में पूरी हिम्मत के साथ बढ़ते जाएँ।

डियर ज़िंदगी, I Love you


कल शाम Dear Zindagi मूवी देखी। तभी से मन में कुछ हलचल सी थी, सोचा कि लिख डालूँ और साझा करूँ।
छोटी सी, प्यारी सी इस ज़िंदगी में रोज़मर्रा की भागदौड़ के बीच हल्की-फुल्की उठापटक, उलझनें और सुलझनें, छोटे-बड़े उतार-चढ़ाव होते रहना स्वाभाविक भी है और लाज़मी भी।
पर क्या हमने ख़ुद से कभी ये छोटा सा सवाल पूछा है कि हम इन मुश्किलों या छुट-पुट दिक्कतों का सामना करने के लिए तैयार हैं? क्या हम अपनी ज़िंदगी से और ख़ुद से सचमुच प्यार करते हैं? कहीं हम आगे बढ़ने की होड़ में रिश्तों और ख़ुद की ज़िंदगी से खिलवाड़ तो नहीं कर रहे?
मन के नाज़ुक से कोने में बसे इसी तरह के कुछ प्रासंगिक और ज़रूरी सवालों के जवाब ढूँढती यह मूवी अनायास ही किस तरह अपने ज़िंदगी को जी भर कर जीने और प्यार करने के नुस्ख़े सिखाती है, आइए जानें:-
- कभी-कभी हम मुश्किल रास्ता इसलिए चुनते हैं क्योंकि हमें लगता है कि महत्वपूर्ण चीज़ पाने के लिए हमें मुश्किल रास्ता चुनना चाहिए। हम मुश्किल रास्ता ही चुनना चाहते हैं। ख़ुद को सज़ा देना चाहते हैं। पर सवाल यह है कि अगर आसान रास्ता उपलब्ध है तो उसे अपनाने में भला क्यों हिचकिचाना? आसान रास्ता भी तो एक रास्ता है।
- जब कुर्सी ख़रीदने के लिए इतने विकल्प देखते हैं, तो ज़िंदगी के महत्वपूर्ण निर्णय लेने में उपलब्ध विकल्पों पर थोड़ा सोचना तो बनता है।
-क्या रोज़ 10 मिनट मम्मी-पापा से बात करना सचमुच इतना मुश्किल काम है?
-जीनियस वो नहीं होता जिसके पास हर सवाल का जवाब हो, बल्कि जिसके पास हर जवाब तक पहुँचने का धैर्य हो।
-हर टूटी हुई चीज़ जोड़ी जा सकती है।
-पागल वो है जो रोज़-रोज़ एक ही काम करता है और चाहता है कि नतीजा अलग हो।
- अपनी ज़िंदगी के स्कूल में हम सब ख़ुद अपने शिक्षक हैं।
- अपनी ज़िंदगी की पहेली को सुलझा आप ख़ुद ही सकते हैं पर दूसरे इसमें आपकी मदद ज़रूर कर सकते हैं।
- जो भी कहना चाहते हो, उसे कह डालो, बजाय दिल पर बोझ रखकर घूमने के।
-ज़िंदगी में जब कोई आदत या पैटर्न बनता दिखाई दे, तो उसके बारे में सोचना चाहिए। अक़्लमंदी ये जानने में है कि कहाँ उस आदत को रोकना है।
- कोई हमें अलविदा न बोल सके, उससे पहले ही हम इस डर से उसे अलविदा बोल देते हैं कि कहीं पहले वह अलविदा न बोल दे।
क्यों न उस डर को अलविदा बोल दें। आओ, आज़ाद हो जाएँ अपने मन में बसे डर से।
किसी शायर ने लिखा भी है-
'मुहब्बत के शहर का आबो-दाना छोड़ दोगे क्या,
जुदा होने के डर से दिल लगाना छोड़ दोगे क्या,
ज़रा सा वक़्त क्या गुज़रा, कि चेहरों पर उदासी है,
ग़मों के ख़ौफ़ से तुम मुस्कुराना छोड़ दोगे क्या।'