अस्त-व्यस्त नहीं, व्यस्त और मस्त रहें...
एक हैं श्रीमान 'क'। सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के प्रति पूर्ण समर्पित। निष्ठा और समर्पण में कोई कमी नहीं। सोने और खाने के लिए कुछ समय बमुश्किल निकालकर, बाक़ी समय बस पढ़ते हैं। इतना पढ़ते हैं कि अड़ोस-पड़ोस के साथी इनसे लगभग भयाक्रांत रहते हैं। लिखते भी ठीक-ठाक हैं और स्मरण शक्ति भी बढ़िया है। सिलेबस भी पूरा तैयार है। इनके रूम पर इतनी किताबें और नोट्स का अंबार है, कि आप देखने मात्र से ही तनाव में आ जाएँ।
पर आश्चर्यजनक रूप से पिछले काफ़ी समय से परीक्षाओं में अपेक्षित सफलता नहीं मिल पा रही है। नतीजा हर बार सिफ़र।
उनके क़रीबी दोस्त बताते हैं कि वे इतनी मेहनत के बावजूद अनियमित और बेतरतीब दिनचर्या के शिकार हैं और विशेषकर परीक्षा के दिनों बेहद तनाव और दुश्चिंता से ग्रस्त हो जाते हैं।
दूसरे हैं श्रीमान 'ख'। जीवन कुछ हद तक व्यवस्थित सा है इनका। अक्सर व्यस्त रहते हैं। पढ़ाई भी जमकर करते हैं और कभी-कभार मस्ती भी। दोस्तों के भी पसंदीदा साथी हैं श्री ख। टाइम मैनेजमेंट ऐसा कि थोड़ा-बहुत वक़्त अपनी रूचियों के लिए भी निकाल ही लेते हैं। जब भी आप इनसे मिलेंगे तो इनके चेहरे पर एक मंद मुस्कान तैरती हुई मिलेगी। परीक्षा के दिनों में अतिरिक्त तनाव इनके लिए अजीब सी बात है और ये जनाब अपने चिरपरिचित शांत स्वभाव को परीक्षाओं में भी क़ायम रखते हैं। इनके बारे में एक और दिलचस्प बात यह है कि जितना इनपुट ये देते हैं, उससे ज़्यादा इनका आउटपुट रहता है। ये महोदय श्रीमान क जितना तो नहीं पढ़ पाते, पर जितना पढ़ते हैं, व्यवस्थित और नियमित ढंग से, वो भी रिवीज़न के साथ।
प्रिय दोस्तों, हमारे आस-पास श्रीमान 'क' और श्रीमान 'ख' जैसे तमाम साथी मिल जाएँगे। हो सकता है कि आप में से भी कई साथियों के लक्षण श्रीमान 'क' या श्रीमान 'ख' से मिलते-जुलते हों। इसी बीच मैं आपसे एक सवाल भी पूछना चाहता हूँ, जिसका ईमानदार जवाब आपको ख़ुद को ही देना है।
क्या आपके साथ भी ऐसी ही समस्या है कि आप मेहनत तो ख़ूब करते हैं, पर नतीजे नहीं मिल पाते। तैयारी भरपूर है पर इतनी अव्यवस्थित है कि आपको ख़ुद नहीं मालूम कि मैंने फ़लाँ टॉपिक कितनी किताबों से या किन-किन स्त्रोतों से पढ़ा है? क्या आपको कभी-कभी ऐसा लगता है, मेरा अमुक साथी जो मुझसे कम पढ़ता था, वह परीक्षा में सफल कैसे हो गया? या मैंने जिसे पढ़ाया, वही मुझे पीछे छोड़कर ख़ुद चयनित हो गया? क्या आपको ऐसा लगता है कि जितनी पढ़ाई मैंने की, उसके अनुरूप मुझे कभी परिणाम मिला ही नहीं। या फिर यह महसूस हुआ हो कि मेरी तैयारी में ऐसी कौन सी कमी है कि सफलता मेरे पास आकर भी दूर छिटक जाती है?
अगर आपको ये सारे सवाल या इनमें से कुछ सवाल भी मथते हैं तो आपको निश्चित रूप से आत्ममंथन कर लेना चाहिए। हो सकता है कि आपकी स्थिति श्रीमान 'क' से मिलती-जुलती हो। हो सकता है कि आप अस्त-व्यस्त तरीक़े से तैयारी करते हों और अस्त-व्यस्त तरीक़े से ही उसे परीक्षा में लिखकर आते हों।
साथियों, आप यह बात समझ रहे होंगे कि दरअसल हमें श्रीमान 'क' से श्रीमान 'ख' तक की यात्रा तय करनी है। सफलता की राह को जटिल न बनाकर उसे सरल और सहज बनाते हुए सफलता की सम्भावना को बढ़ाना है और आगे बढ़ते जाना है।
आपने समझा कि 'अस्त-व्यस्त' तरीक़े से पढ़ाई और तैयारी के क्या-क्या साइड इफ़ेक्ट होते है? जबकि हमारे ही बीच कुछ साथी व्यस्त और मस्त रहकर अपेक्षाकृत कम तैयारी के बावजूद बेहतर नतीजे हासिल कर लेते हैं।
आइए, चर्चा करते हैं कि ऐसा क्यों होता है। दरअसल 'व्यस्त' रहना एक बात है, और 'अस्त-व्यस्त' रहना दूसरी बात। सफल होने और साथ ही ख़ुश रहने के लिए, व्यस्त रहना निश्चय ही ज़रूरी है, पर अस्त-व्यस्त तरीक़े से व्यस्त रहना क़तई ज़रूरी नहीं है। इसके बजाय मस्त रहते हुए व्यस्त रहना कई गुना बेहतर है। मस्त और व्यस्त रहने का सीधा सा फ़ायदा यह होता है कि आप व्यर्थ के तनाव से बचे रहते हैं और परीक्षा में भी शांत और सहज मन से बेहतर प्रदर्शन कर पाते हैं।
आइए, जानें, 'व्यस्त और मस्त' रहने के फ़ायदे-
-आप अमूमन प्रसन्न रहते हैं और आपमें सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बना रहता है।
- आप जो भी पढ़ते हैं, उसे एंजॉय करते हैं और तनावपूर्ण समय में भी सहज रहते हैं।
- सहज और शांत रहने की इस आदत के चलते आप परीक्षा हॉल में भी आपका प्रदर्शन औसत से बेहतर रहता है, क्योंकि आप दिमाग पर अनावश्यक भार रखे बिना खुलकर लिख पाते हैं।
- साथ ही साथ आप परीक्षा के परिणाम को लेकर ज़्यादा चिंतित भी नहीं होते और हर परिस्थिति के लिए तैयार रहते हैं। एक कहावत भी है- 'Try for the best, prepare for the worst.'
दरअसल व्यस्त रहना एक नियामत की तरह है। और अगर मस्त रहकर व्यस्त रहा जाय, तो यह सोने पर सुहागा ही है। व्यस्त रहने से आपको एक संतुष्टि का भाव महसूस होता है और आप अपने दिन को जस्टीफ़ाई कर पाते हैं।
पर आख़िर ऐसे कौन से तरीक़े हैं, जिनसे हम अपनी आदत में कुछ बदलाव लाते हुए बिज़ी रहते हुए भी ख़ुश रह सकते हैं।
- दिनचर्या को नियमित करने की कोशिश करें। 'परफ़ेक्ट' दिनचर्या जैसी कोई चीज़ नहीं होती। जहाँ तक सम्भव हो, एक ठीक-ठाक दिनचर्या बनाकर उसका पालन करने की कोशिश करें।
- अस्त-व्यस्त और अव्यवस्थित रहने की आदत से धीरे-धीरे छुटकारा पाएँ। जैसे कि आप स्टडी का एक शेड्यूल बना लें, जिसमें पढ़ाई के साथ-साथ अभ्यास, रिवीज़न और लेखन का भी समुचित स्थान हो।
- अपने स्वत्व और सहजता को बनाए रखें। अपने शौक़ व रूचियों और फ़िटनेस व हाईजीन का भी ख़याल रखें। अपनी दिनचर्या में योग व प्राणायाम को शामिल करने का प्रयास करें।
- व्यस्त रहना आपको शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ बनाए रखता है। पर साथ ही प्रसन्नचित्त और मस्त रहकर पढ़ाई करने का अपना हो आनंद है।
- स्वयं ख़ुश रहें, तभी आप दूसरों को भी ख़ुश कर सकते हैं। प्रसन्नता संक्रामक होती है। भीतर से ख़ुश रहें और बाहर भी ख़ुश दिखें।
शुभकामनाओं सहित-
निशान्त
(लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं।)
धन्यवाद सर बहुत ही उपयोगी है यह लेख हमारे लिए🙏🙏🙏🙏
ReplyDeleteThank you!
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