Tuesday, 25 April 2017

'क्यों अपनाएँ मध्यम मार्ग?'

'क्यों अपनाएँ मध्यम मार्ग?'


क्या कभी हमने यह भी सोचा है कि हम सिविल सेवा परीक्षा या अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में सम्मिलित क्यों होते हैं? क्यों हम दिन-रात एक कर, निरंतर कठिन परिश्रम कर परीक्षा में सफलता के लिए पूरा ज़ोर लगा देते हैं? क्यों हम चौतरफ़ा दबावों और तनावों के बीच तपकर इस कंटक पथ पर चलकर सब कुछ समर्पित कर देते हैं?
यद्यपि सबकी प्राथमिकतायें और उद्देश्य अलग-अलग हो सकते हैं, पर अगर कभी फ़ुर्सत में ठंडे दिमाग़ से इस सवाल का जवाब सोचें, तो मोटे तौर पर कुछ बातें सामने आती हैं, जैसे-
-एक बेहतर और सुखमय जीवन की कामना,
-जीवन में उत्कृष्टता के लिए कोशिश
- अच्छे और प्रतिष्ठित कैरियर की तलाश 
- माता-पिता/परिवार/ शिक्षकों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने का ख़्वाब
- अपने सपनों को साकार करने की इच्छा, आदि।

अपने इन सपनों को साकार करने के प्रयासों की राह बहुत कठिन नहीं है, परंतु इतनी सरल और एकरेखीय भी नहीं है।  जिस तरह ज़िन्दगी बहुपक्षीय और बहुआयामी है, उसी तरह सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी की प्रक्रिया भी ठीक-ठाक लम्बी और उलझाऊ सी है। मेरी व्यक्तिगत राय है कि इस उलझन, बोझ, ऊहापोह और तनाव से निपटने का शानदार और ज़बरदस्त रास्ता बुद्ध के 'मध्यम मार्ग' में छिपा है।
बौद्ध दर्शन के प्रमुख सिद्धांतों में से एक मध्यम मार्ग को पाली साहित्य में 'मज्झिमा परिपदा' कहा गया है, जिसे सामान्य तौर पर अंग्रेज़ी में 'Middle Path' या 'golden mean' भी कहा जाता है। बुद्ध ने अति 'कायक्लेश' और 'भोगवाद' के बीच का 'मध्यम मार्ग' सुझाया और स्वयं भी उसी पर आगे बढ़े। बुद्ध का यह मध्यम मार्ग का दर्शन भारतीय औपनिषदिक समावेशी (inclusive) और सहिष्णु  (tolerant) चिंतन प्रक्रिया के काफ़ी नज़दीक है।

 मध्यम मार्ग का यह सिद्धांत वर्धमान महावीर के 'अनेकांतवाद' व 'स्यादवाद' के भी काफ़ी नज़दीक है। अनेकांतवाद सिखाता है कि कोई भी कथन स्वयं में पूर्ण (absolute) नहीं है। किसी भी बात या धारणा को एक नहीं, बल्कि अनेक पहलुओं से समझा जा सकता है। हर बात को समझने के कई दृष्टिकोण या नज़रिए हो सकते हैं। सात अंधे जब एक हाथी को अलग-अलग अंगों पर स्पर्श करते हैं, तो उसकी आकृति को लेकर अपनी अलग-अलग धारणाएँ बनाते हैं। कोई हाथी की पूँछ को छूकर उसे 'झाड़ू' समझता है, तो कोई उसके कान छूकर उसे 'पंखा'। उन सातों दृष्टिबाधित व्यक्तियों का अपना-अपना सत्य है, जो उनके नज़रिए से भले ही ठीक हो, पर ज़ाहिर है कि यह सत्य अधूरा है। इसी लिए अंग्रेज़ी में एक कहावत भी है- 'Truth lies somewhere in between.'
आप पाएँगे कि सत्य देश-काल-समाज-परिस्थिति सापेक्ष भी हो सकता है। उदाहरण के तौर पर पूरब के नैतिकता के मानदंड पश्चिम के मानदंडों से काफ़ी भिन्नता रखते हैं। कहीं मृत्युदंड अवैध और अनैतिक भी है, तो कहीं न्यायसंगत और वैध; कहीं समलैंगिक विवाह क़ानूनन व नैतिक तौर पर स्वीकार्य है, तो कहीं इस बारे में सोचना भी अनैतिक माना जाता है। इस तरह के तमाम उदाहरण हमारे आस-पास दिखते हैं, जिनसे हम आसानी से समझ सकते हैं, कि कैसे अपने-अपने नज़रिए के आधार पर लोग अपने सच का संसार निर्मित करते जाते हैं।
अनेकांतवाद और मध्यम मार्ग की इन अवधारणाओं को संक्षेप में समझने के बाद अब हम यह समझने की कोशिश करते हैं, कि सिविल सेवा परीक्षा या अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं सहित ज़िंदगी के हर मोड़ पर, किस तरह ये दोनों परस्पर पूरक से दिखने वाले सिद्धांत आपकी मुश्किल राह को आसान और सहज बनाने में मदद करते हैं।
- मुख्य परीक्षा में निबंध या सामान्य अध्ययन के प्रश्नों के उत्तर लिखते वक़्त एक बड़ा कंफ्यूजन इस बात को लेकर रहता है कि विचारों का संतुलन कैसे बनाएँ। इसमें निस्सन्देह मध्यम मार्ग मदद करता है। 
- एक बेहतर निबंध तभी लिखा जा सकता है, जब उसमें उस विषय के सभी सम्भव पहलुओं और पक्ष-विपक्ष पर पर्याप्त प्रकाश डालते हुए, विचारों को व्यवस्थित ढंग से अभिव्यक्त किया गया हो। इसमें अनेकांतवाद और मध्यम मार्ग, दोनों काफ़ी सहायक साबित हो सकते हैं।
- सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के दौरान सीखने की प्रवृत्ति (learner's attitude) होना काफ़ी काम आता है। यदि आप अतियों (extremes) की ओर न झुककर मध्यम मार्ग के हिमायती हैं, तो आप नयी चीज़ें सीखने के प्रति तत्पर रहते हैं, और दूसरों के विचारों का भी सम्मान करना सीखते हैं। यूँ भी ऋग्वेद में लिखा है- 'आ नो भद्रा कृतवो यंतु विश्वतः' (विश्व भर से श्रेष्ठ विचार हमारी ओर आएँ।)
-मुख्य परीक्षा और इंटरव्यू में अनेक बार किसी टॉपिक का विश्लेषण करते वक़्त निष्कर्ष में कोई स्पष्ट मत व्यक्त करना होता है। उस विश्लेषण को श्रेय मिलता है, जिसमें टॉपिक के विविध पहलुओं को व्यवस्थित ढंग से विश्लेषित कर अंत में एक संतुलित राय व्यक्त की जाए। स्पष्ट है कि ये दोनों सिद्धांत इस संतुलित दृष्टिकोण के निर्माण में काफ़ी मदद करते हैं।
- तैयारी की लम्बी और उबाऊ प्रक्रिया में कई बार असफलता का सामना भी करना पड़ सकता है। छोटी-छोटी असफलताओं को सम्भालना और उनमें विचलित हुए बग़ैर स्थिर रहना आज के तनाव भरे दौर में थोड़ा मुश्किल है। तैयारी के दौरान रोज़मर्रा की दिनचर्या में भी समय-समय पर विभिन्न कारणों से तनाव, निराशा या कुंठा की स्थितियाँ पैदा होती रहती हैं। ऐसा होना स्वाभाविक भी है। पर इन स्थितियों से निपटने में अनेकांतवाद और मध्यम मार्ग के साथ-साथ गीता का 'निष्काम कर्मयोग' भी काफ़ी सहायता करते हैं। नतीजों के प्रति आसक्त (attach) हुए बिना पूर्ण मनोयोग और पुरुषार्थ से काम करना, सिविल सेवा परीक्षा या किसी भी प्रतियोगी परीक्षा के लिए बेहद ज़रूरी और लगभग अनिवार्य सा ही है।
- परफ़ेक्शन की ज़िद और सब कुछ बेस्ट पाने की चाहत आज के दौर में युवाओं पर जुनून की हद तक सवार है। पर जब आप अनेकांतवाद की मदद से यह समझ पाते हैं, कि कुछ भी बेस्ट नहीं है, और कोई भी धारणा शत प्रतिशत सत्य नहीं है, तो आप ज़्यादा सहज होकर तैयारी कर पाते हैं।
- इंटरव्यू के दौरान आपकी विनम्रता और सहजता आपकी परफ़ोरमेंस पर काफ़ी सकारात्मक असर डालती है। जब आप दूसरों के विचारों और ज्ञान के अथाह भंडार का सम्मान करते हुए, आप ख़ूब पढ़ते-लिखते और समझते हैं, तो आपको ज्ञान की विराटता व ख़ुद की अल्पज्ञता का अहसास होता है। इसका असर यह होता है आप और विनम्र होते जाते हैं। किसी विद्वान ने कहा भी है- 'शिक्षा अपने अज्ञान की प्रगतिशील खोज है।' सुकरात जैसे दार्शनिक ने इसीलिए कहा था- 'मैं ज्ञानी इस अर्थ में हूँ कि मैं यह जानता हूँ कि मैं कुछ नहीं जानता।' 

सच तो यह है कि भारतीय दर्शन के ये तीनों सिद्धांत -निष्काम कर्मयोग, अनेकांतवाद और मध्यम मार्ग; सिविल सेवा परीक्षा सहित किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में ही नहीं, बल्कि ज़िंदगी के हर मोड़ पर आपको अधिक परिपक्व, सहज, संयत, सहिष्णु और सक्षम बनाते हैं। बशर्ते इनके सही अर्थ को समझकर, रोज़मर्रा के जीवन में इनका समावेश कर लिया जाए।
- निशान्त जैन 
(लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं)



Thursday, 23 March 2017

सतह पर ही न रहें, मर्म भी समझें ....


सतह पर ही न रहें, मर्म भी समझें....


किसी नगर में चार ब्राह्मण रहते थे। उनमें खासा मेल-जोल था। बचपन में ही उनके मन में आया कि कहीं चलकर पढ़ाई की जाए।
अगले दिन वे पढ़ने के लिए कन्नौज नगर चले गये। वहाँ जाकर वे किसी पाठशाला में पढ़ने लगे। बारह वर्ष तक जी लगाकर पढ़ने के बाद वे सभी अच्छे विद्वान हो गये।
अब उन्होंने सोचा कि हमें जितना पढ़ना था पढ़ लिया। अब अपने गुरु की आज्ञा लेकर हमें वापस अपने नगर लौटना चाहिए। यह निर्णय करने के बाद वे गुरु के पास गये और आज्ञा मिल जाने के बाद पोथे सँभाले अपने नगर की ओर रवाना हुए।
अभी वे कुछ ही दूर गये थे कि रास्ते में एक तिराहा पड़ा। उनकी समझ में यह नहीं आ रहा था कि आगे के दो रास्तों में से कौन-सा उनके अपने नगर को जाता है। अक्ल कुछ काम न दे रही थी। वे यह निर्णय करने बैठ गये कि किस रास्ते से चलना ठीक होगा।
अब उनमें से एक पोथी उलटकर यह देखने लगा कि इसके बारे में उसमें क्या लिखा है।
संयोग कुछ ऐसा था कि उसी समय पास के नगर में एक बनिया मर गया था। उसे जलाने के लिए बहुत से लोग नदी की ओर जा रहे थे। इसी समय उन चारों में से एक ने पोथी में अपने प्रश्न का जवाब भी पा लिया। कौन-सा रास्ता ठीक है कौन-सा नहीं, इसके विषय में उसमें लिखा था, ‘‘महाजनो येन गतः स पन्था।’’
किसी ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि यहाँ महाजन का अर्थ क्या है और किस मार्ग की बात की गयी है। श्रेणी या कारवाँ बनाकर निकलने के कारण बनियों के लिए महाजन शब्द का प्रयोग तो होता ही है, महान व्यक्तियों के लिए भी होता है, यह उन्होंने सोचने की चिन्ता नहीं की। उस पण्डित ने कहा, ‘‘महाजन लोग जिस रास्ते जा रहे हैं उसी पर चलें!’’ और वे चारों श्मशान की ओर जानेवालों के साथ चल दिये।
श्मशान पहुँचकर उन्होंने वहाँ एक गधे को देखा। एकान्त में रहकर पढ़ने के कारण उन्होंने इससे पहले कोई जानवर भी नहीं देखा था। एक ने पूछा, ‘‘भई, यह कौन-सा जीव है?’’
अब दूसरे पण्डित की पोथी देखने की बारी थी। पोथे में इसका भी समाधान था। उसमें लिखा था।
'उत्सवे व्यसने प्राप्ते दुर्भिक्षे शत्रुसंकटे।
राजद्वारे श्मशाने च यः तिष्ठति सः बान्धवः।'
बात सही भी थी, बन्धु तो वही है जो सुख में, दुख में, दुर्भिक्ष में, शत्रुओं का सामना करने में, न्यायालय में और श्मशान में साथ दे।
उसने यह श्लोक पढ़ा और कहा, ‘‘यह हमारा बन्धु है।’’ अब इन चारों में से कोई तो उसे गले लगाने लगा, कोई उसके पाँव पखारने लगा।
अभी वे यह सब कर ही रहे थे कि उनकी नजर एक ऊँट पर पड़ी। उनके अचरज का ठिकाना न रहा। वे यह नहीं समझ पा रहे थे कि इतनी तेजी से चलने वाला यह जानवर है क्या बला!
इस बार पोथी तीसरे को उलटनी पड़ी और पोथी में लिखा था, 'धर्मस्य त्वरिता गतिः'।
धर्म की गति तेज होती है। अब उन्हें यह तय करने में क्या रुकावट हो सकती थी कि धर्म इसी को कहते हैं। पर तभी चौथे को सूझ गया एक रटा हुआ वाक्य, 'इष्टं धर्मेण योजयेत' यानि प्रिय को धर्म से जोड़ना चाहिए।
अब क्या था। उन चारों ने मिलकर उस गधे को ऊँट के गले से बाँध दिया।
अब यह बात किसी ने जाकर उस गधे के मालिक धोबी से कह दी। धोबी हाथ में डण्डा लिये दौड़ा हुआ आया। उसे देखते ही वे वहाँ से चम्पत हो गये।
वे भागते हुए कुछ ही दूर गये होंगे कि रास्ते में एक नदी पड़ गयी। सवाल था कि नदी को पार कैसे किया जाए। अभी वे सोच-विचार कर ही रहे थे कि नदी में बहकर आता हुआ पलाश का एक पत्ता दीख गया। संयोग से पत्ते को देखकर पत्ते के बारे में जो कुछ पढ़ा हुआ था वह एक को याद आ गया। 'आगमिष्यति यत्पत्रं तत्पारं तारयिष्यति।' यानि आनेवाला पत्र ही पार उतारेगा।
अब किताब की बात गलत तो हो नहीं सकती थी। एक ने आव देखा न ताव, कूदकर उसी पर सवार हो गया। तैरना उसे आता नहीं था। वह डूबने लगा तो एक ने उसको चोटी से पकड़ लिया। उसे चोटी से उठाना कठिन लग रहा था। यह भी अनुमान हो गया था कि अब इसे बचाया नहीं जा सकता। ठीक इसी समय एक दूसरे को किताब में पढ़ी एक बात याद आ गयी कि यदि सब कुछ हाथ से जा रहा हो तो समझदार लोग कुछ गँवाकर भी बाकी को बचा लेते हैं। सबकुछ चला गया तब तो अनर्थ हो जाएगा।
यह सोचकर उसने उस डूबते हुए साथी का सिर काट लिया।
अब वे तीन रह गये। जैसे-तैसे बेचारे एक गाँव में पहुँचे। गाँववालों को पता चला कि ये ब्राह्मण हैं तो तीनों को तीन गृहस्थों ने भोजन के लिए न्यौता दिया। एक जिस घर में गया उसमें उसे खाने के लिए सेवईं दी गयीं। उसके लम्बे लच्छों को देखकर उसे याद आ गया कि दीर्घसूत्री नष्ट हो जाता है, दीर्घसूत्री विनश्यति। मतलब तो था कि दीर्घसूत्री या आलसी आदमी नष्ट हो जाता है पर उसने इसका सीधा अर्थ लम्बे लच्छे और सेवईं के लच्छों पर घटाकर सोच लिया कि यदि उसने इसे खा लिया, तो नष्ट हो जाएगा। वह खाना छोड़कर चला आया।
दूसरा जिस घर में गया था वहाँ उसे रोटी खाने को दी गयी। पोथी फिर आड़े आ गयी। उसे याद आया कि अधिक फैली हुई चीज की उम्र कम होती है, 'अतिविस्तार विस्तीर्णं तद् भवेत् न चिरायुषम्।' वह रोटी खा लेता तो उसकी उम्र घट जाने का खतरा था। वह भी भूखा ही उठ गया।
तीसरे को खाने के लिए ‘बड़ा’ दिया गया। उसमें बीच में छेद तो होता ही है। उसका ज्ञान भी कूदकर उसके और बड़े के बीच में आ गया। उसे याद आया, 'छिद्रेष्वनर्था बहुली भवन्ति।' छेद के नाम पर उसे बड़े का ही छेद दिखाई दे रहा था। छेद का अर्थ भेद का खुलना भी होता है, यह उसे मालूम ही नहीं था। वह बड़े खा लेता तो उसके साथ भी अनर्थ हो जाता। बेचारा वह भी भूखा रह गया।
लोग उनके ज्ञान पर हँस रहे थे पर उन्हें लग रहा था कि वे उनकी प्रशंसा कर रहे हैं। अब वे तीनों भूखे-प्यासे ही अपने-अपने नगर की ओर रवाना हुए।
यह कहानी सुनाने के बाद स्वर्णसिद्धि ने कहा, ‘‘तुम भी दुनियादार न होने के कारण ही इस आफत में पड़े। इसीलिए मैं कह रहा था शास्त्रज्ञ होने पर भी मूर्ख मूर्खता करने से बाज नहीं आते।’’
                पंचतंत्र की यह रोचक कहानी स्वयं में बहुत से निहितार्थ समेटे हुए है। पढ़े-लिखे होकर भी लकीर के फ़क़ीर बने रहने वाले इन चार विद्यार्थियों की यह कहानी थोड़ी अतिशयोक्तिपूर्ण ज़रूर लगती है, पर यह प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर हमें ज़िंदगी और साथ ही परीक्षा की तैयारी के लिए दिशा देने का काम भी करते है। आइए, चर्चा करें-
आपके अंग्रेज़ी का एक मुहावरा सुना होगा, 'Reading between the lines'। साथ ही एक और मुहावरा है, 'in black and white.' पहले मुहावरे का अर्थ है, जो स्पष्ट तौर पर लिखा हुआ नहीं दिख रहा है, उसके वास्तविक अर्थ या मर्म (essence) को समझना। दूसरे मुहावरे का अर्थ है, सब कुछ एकदम स्पष्ट होना और कोई कंफ्यूजन न होना। reading between the lines की प्रासंगिकता नए पैटर्न में इसलिए ज़्यादा है क्योंकि सब कुछ in black and white उपलब्ध नहीं होता। कहने का मतलब यह है, कि किसी भी कथन या अध्ययन सामग्री का शाब्दिक (literal) अर्थ पकड़कर लकीर के फ़क़ीर बनने के बजाय उसका निहित अर्थ या वास्तविक मर्म/अभिप्राय समझना ही आज की माँग है।
                 संघ लोक सेवा आयोग और राज्य लोक सेवा आयोगों के नए पैटर्न में आप यह बदलाव महसूस करेंगे कि अब लकीर के फ़क़ीर बने रहकर या चीज़ों को केवल कंठस्थ करके सफलता पाना सम्भव नहीं है, जब तक उनके अर्थ या मर्म को हृदयंगम न  कर लिया जाय। चाहे वैकल्पिक विषय की अवधारणाएँ हों या करेंट अफ़ेयर्स का आधारभूत सामान्य अध्ययन से सम्बंध; निबंध के लिए सामान्य समझ हो या एथिक्स में एक संतुलित दृष्टिकोण; इन सबके लिए ही पाठ्यक्रम के मर्म और अपेक्षा को समझते हुए अपनी समझ का विस्तार करना ज़रूरी है।
            आइए, समझने की कोशिश करें कि किन आसान तरीक़ों की मदद से हम सतही ज्ञान से गहन और मार्मिक ज्ञान की ओर बढ़कर सफलता की सम्भावनाओं को बढ़ा सकते हैं:-
- जब भी कोई नया विषय या टॉपिक पढ़ें, तो सबसे पहले उसे तसल्ली से सरसरी तौर पर बिना किसी दबाव के, पढ़ लें।
- इस दौरान कोशिश करें कि महत्वपूर्ण बिंदुओं या अंशों को रेखांकित (underline) या हाईलाइट करते चलें। ध्यान रहे, बहुत ज़्यादा हिस्सा रेखांकित न हो।
- जब आपका किसी नए पारिभाषिक शब्द (terminology) या नयी अवधारणा (concept) से हो, तो उसको अलग से नोट करके उसका अर्थ समझने की कोशिश करें। इसके लिए किसी कोश या विकिपीडिया/इंटरनेट का भी सहारा ले सकते हैं। यदि ज़रूरत महसूस हो तो किसी संदर्भ ग्रंथ (reference book) की भी मदद ले सकते हैं।
- पढ़ना एक बात है और उसे समझना व उस पर मनन करना दूसरी। अधिगम (learning) की प्रक्रिया, पढ़ने के साथ-साथ रिवीज़न, चिंतन-मनन और श्रवण (listening) और चर्चा (discussion) से होकर पूर्ण होती है। अतः सतही ज्ञान से आगे बढ़ने के लिए पढ़ाई के इन आवश्यक घटकों का भी भरपूर इस्तेमाल करें। इस बात का भी ध्यान रखें कि आपको इस परीक्षा में सफलता के लिए विशेषज्ञ (specialist) नहीं, सामान्यज्ञ (generalist) ही बनना है।
- उपनिषद में कहा गया है कि 'वाद-विवाद-संवाद से तत्वबोध होता है', लिहाज़ा चर्चा के लिए हमेशा सहज रहें।
- दूसरों के विचारों का सम्मान करना सीखें और सहिष्णु बनें ताकि निरंतर कुछ नया सीख सकें।
- हमेशा सीखने को तैयार रहें और चारों और से बेहतर विचारों (ideas) को अपनी ओर आने दें।
- परीक्षा की तैयारी के दौरान सामान्य अध्ययन के विभिन्न खंडों (segments) को बिलकुल अलग-अलग मानकर न देखें। इन्हें परस्पर कनेक्ट करके समझें। ये विभिन्न खंड आपस में जुड़े होते हैं और एक क्षेत्र में हुए बदलाव का असर दूसरे क्षेत्र पर भी पड़ता है। 
- अध्ययन सामग्री को व्यवस्थित करना भी ज़रूरी है। एक टॉपिक के लिए बहुत सारे स्त्रोतों को पढ़ने की ज़रूरत नहीं है।स्त्रोतों में आवश्यकतानुसार विविधता रखें और जो भी टॉपिक जहाँ से भी पढ़ें, उसे कहीं डायरी में नोट भी कर लें।
- नए पैटर्न के मुताबिक़, सतही ज्ञान आपको बहुत आगे तक नहीं ले जा सकता। आपके उत्तर पढ़कर आपके ज्ञान और समझ के स्तर का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। अतः अपने उत्तरों को अधिक परिपक्व (mature) बनाने के लिए सतही ज्ञान से आगे बढ़ें और मर्म तक पहुँचने की कोशिश करें।

-निशान्त जैन 
(लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं)

Monday, 6 March 2017

क्यों पढ़ें यह किताब : 'मुझे बनना है UPSC टॉपर' : लेखक- निशान्त जैन (प्रकाशक- प्रभात प्रकाशन, दिल्ली)

'मुझे बनना है UPSC टॉपर' - निशान्त जैन, IAS 
(Rank 13, UPSC-2014, हिन्दी माध्यम टॉपर)

(सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के लिए सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शक पुस्तक)


किताब के बारे में...

गत वर्ष सिविल सेवा परीक्षा में 13 वीं रैंक हासिल कर हिन्दी माध्यम में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करने वाले 2015 बैच के प्रशिक्षु आई.ए.एस. अधिकारी निशान्त जैन की पहली किताब 'मुझे बनना है UPSC टॉपर' अब बाज़ार में व ऑनलाइन उपलब्ध है। प्रभात प्रकाशन, नयी दिल्ली द्वारा प्रकाशित इस किताब में निशान्त जैन ने IAS व PCS परीक्षाओं की सम्पूर्ण तैयारी से जुड़े सभी महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डाला है।
कुल 18 अध्यायों के माध्यम से उन्होंने नए पैटर्न के मुताबिक़ प्री, मेन्स, इंटरव्यू तीनों चरणों की रणनीति, निबंध, लेखन कौशल, व्यक्तित्व विकास, मोटिवेशन लेवल, स्टडी मैटेरियल आदि सब पर खुलकर सहज भाषा में चर्चा की है। पुस्तक के अंत में हाल के वर्षों में सिविल सेवा परीक्षा में सफल कुछ चुनिंदा युवाओं की सफलता की संघर्षपूर्ण और अनकही कहानियाँ भी शामिल की गयी हैं। 



किताब की भूमिका जाने-माने सूफ़ी गायक कैलाश खेर (पद्मश्री से सम्मानित जाने-माने सूफी गायक) ने और सम्मतियाँ- आलोक सिन्हा जी,  (वरिष्ठ IAS अधिकारी, उत्तर प्रदेश) श्रीमती मालिनी अवस्थी (पद्मश्री से सम्मानित लोक गायिका), आनंद कुमार (सुपर 30), गौरव अग्रवाल (IAS टॉपर,2013 ) और लेखक नीलोत्पल मृणाल (साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार विजेता) ने लिखी हैं।
272 पृष्ठों की इस किताब की क़ीमत मात्र 195 रुपए है।

क्यों ख़ास है यह किताब ?


• परीक्षा की समग्र, संपूर्ण और व्यापक तैयारी के टिप्स 
• तैयारी के अनछुए पहलुओं पर खुलकर चर्चा 

• परीक्षा के लिए कैसे सँवारें अपना व्यक्तित्व 

• 
सकारात्मकता और मोटिवेशन लेवल कैसे बनाए रखें 
• प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और इंटरव्यू के लिए विस्तृत मार्ग दर्शन 

• 
निबंध और एथिक्स में श्रेष्ठ अंक कैसे पाएँ 
• 
लेखन कौशल को कैसे सुधारें 
• 
क्या पढ़ें, क्या न पढ़ें और कैसे पढ़ें 
• 
नए पैटर्न में कैसी हो प्रासंगिक रणनीति 
• साथ में सफलता की
 कुछ अनकही कहानियाँ भी..


लेखक परिचय-

निशान्त जैन, 
हिंदी माध्यम के IAS टॉपर
रैंक 13, UPSC CSE-2014


यूपीएससी की वर्ष 2014 की सिविल सेवा परीक्षा में 13वीं रैंक हासिल करने वाले निशान्त जैन, हिन्दी/भारतीय भाषाओं के माध्यम के टॉपर हैं। मुख्य परीक्षा में देश के तीसरे सर्वाधिक अंक (851अंक) प्राप्त करने वाले निशान्त ने निबंध के प्रश्नपत्र में 160 अंक और वैकल्पिक विषय- हिन्दी साहित्य में 313 अंक प्राप्त किये हैं, जो संभवतः सर्वाधिक अंक हैं। उत्तर प्रदेश के छोटे से शहर, मेरठ में साधारण पृष्ठभूमि में पले-बढ़े, निशान्त 2013 में UPSC की सिविल सेवा परीक्षा के अपने पहले प्रयास में प्रारंभिक परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो पाये थे।



इतिहास, राजनीति विज्ञान और अंग्रेजी में ग्रेजुएशन और हिंदी साहित्य में पोस्ट-ग्रेजुएशन के बाद यूजीसी की नेट-जे.आर.एफ. उत्तीर्ण की। कॉलिज के दिनों में डिबेट, काव्यपाठ और एंकरिंग के शौक़ीन रहे निशान्त ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से एम.फिल. की और लोक सभा सचिवालय के राजभाषा प्रभाग दो साल काम भी किया।

कविताएं लिखने और युवाओं से संवाद स्थापित करने में रूचि रखने वाले निशान्त; भाषा-साहित्य-संस्कृति, सृजनात्मक लेखन, शिक्षा, समाज कार्य और वंचित वर्गों के कल्याण के क्षेत्रों में गहरा रुझान रखते हैं। वह 2015 बैच के आई.ए.एस. प्रशिक्षु अधिकारी हैं। 

ब्लॉग- nishantjainias.blogspot.in


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प्रभात प्रकाशन, 4/19, आसफ़ अली मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली -110002

प्रभात प्रकाशन का हेल्पलाइन नम्बर- 7827007777
(सुबह 10 से शाम 6 बजे तक)





Friday, 17 February 2017

सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी हेतु एक सम्पूर्ण किताब : 'मुझे बनना है UPSC टॉपर' -द्वारा- निशान्त जैन



सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी हेतु एक सम्पूर्ण किताब :
'मुझे बनना है UPSC टॉपर' -द्वारा- निशान्त जैन
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प्रिय दोस्तों, उम्मीद है, आप हमेशा की तरह मस्त और व्यस्त होंगे। आखिर इंतज़ार की घड़ियाँ ख़त्म हुई। आपके लिए प्रस्तुत है मेरी ओर से नए साल 2017 का नया और अनूठा उपहार...
मेरी यह किताब -'मुझे बनना है UPSC टॉपर' अब उपलब्ध है। आप इस link पर क्लिक करके इस किताब को amazon पर online खरीद सकते हैं और अपने नज़दीकी बुक स्टॉल से भी। क़ीमत है मात्र 195 रूपए, जो Amazon पर मात्र 163 रुपए में उपलब्ध है। मुझे पूरा विश्वास है कि सिविल सेवा परीक्षा की सम्पूर्ण तैयारी से जुड़े हर पहलू को समेटती यह किताब अपने 18 अध्यायों के माध्यम से परीक्षा की तैयारी के कठिन सफर को आसान बनाने में हर मोड़ पर आपका साथ निभाएगी।
नए पैटर्न में, UPSC की सिविल सेवा परीक्षा में एथिक्स के पेपर में एक सवाल आया- 'आपके लिए सुख की परिभाषा क्या है?' मैंने लिखा- 'जोय ऑफ़ गिविंग' या देने का सुख, मदद करने का सुख। हम पूरी ज़िंदगी किसी न किसी रूप में किसी न किसी की निस्वार्थ भाव से मदद करते ही हैं। आपने भी की होगी। आपने महसूस किया होगा कि उस सुख से मिलने वाला आनंद कितना असीम और अनूठा होता है। जुलाई 2015 की गर्म दोपहर में जब UPSC का परिणाम आया और मुझे अपेक्षा से भी बेहतर सफलता मिली तो लगा कि मदद करने का सुख अब भरपूर मिलेगा। सिविल सेवाओं की ख़ूबी यही है कि ये जीवन के विविध क्षेत्रों में बेहतर काम का बड़ा प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराती हैं और साथ ही कुछ अच्छा योगदान कर 'जॉय ऑफ़ गिविंग' का एक बेहतरीन अवसर तो देती ही हैं।
IAS की परीक्षा में श्रेष्ठ रैंक हासिल करना किसी भी युवा का स्वप्न हो सकता है, पर हर किसी के पास पर्याप्त साधन और संसाधन हों, ये ज़रूरी नहीं। सफलता की राह में कई अड़चनें या रुकावटें हो सकती हैं; किसी के लिए भाषा या मीडियम की वजह से, किसी के लिए ग्रामीण या क़स्बाई पृष्ठभूमि की वजह से तो किसी मामले मैं कमज़ोर सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के कारण। ऐसे में कभी कभी निराशा, अवसाद और उलझनें भी पनपने लगती हैं।
लाख टके का सवाल है कि क्या कोई ऐसा तरीक़ा है, जिससे हम अपनी निराशा से उबर कर, सकारात्मक सोच के साथ, 'अपनी लकीर बड़ी करते हुए' आगे बढ़ें और सफलता का स्वप्न साकार कर पाएँ। यह किताब दरअसल इसी दिशा में एक छोटा सा प्रयास है। साथ ही समय-समय पर प्राप्त होने वाले सवालों और शंकाओं-संदेहों के निराकरण की ईमानदार कोशिश भी।
साथ ही एक और बात भी इस किताब के सृजन से जुड़ी है। सिविल सेवा परीक्षा में चयन के बाद अनेक अवसरों पर युवाओं से संवाद के दौरान मैंने यह स्पष्ट तौर पर महसूस किया कि उन्हें नए पैटर्न की अपेक्षा के अनुरूप, परीक्षा की समग्र तैयारी के लिए एक सम्पूर्ण किताब की शिद्दत से ज़रूरत है। अभी परीक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए ऐसे कई अनिवार्य पहलू हैं, जिनके प्रति हम जागरूक नहीं हैं। साथ ही, अनजाने में हम बहुत सी ऐसी ग़लतियाँ कर बैठते हैं, जिन्हें सही मार्गदर्शन से सुधारा जा सकता था। साथ ही मैंने यह भी महसूस किया कि ऐसे तमाम युवा अभ्यर्थी हैं, जो बाहर जाकर तैयारी नहीं कर सकते। दूर-दराज़ के गाँवों-क़स्बों-शहरों में रहने वाले ऐसे साथियों के लिए ऐसी एक समग्र किताब एक बड़ी ज़रूरत बन गयी थी। और अगर ऐसी कोई किताब हिन्दी में हो, तो सोने पर सुहागा। हिन्दी में इस तरह की किताबों का ज़बरदस्त अकाल सा है। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि मेरे लिए यह किताब एक 'दायित्व बोध' और 'कमिटमेंट' की तरह है।
मुझे लगता है कि इस किताब की एक और विशेषता इसे ख़ास बनाती है। यह है- इसकी सबके लिए अनुकूलता। यह किताब ऐसे युवा साथियों के लिए तो ज़रूरी है ही, जो सिविल सेवा अधिकारी बनने का सपना सभी रहे हैं, साथ ही इसमें ऐसे साथियों के लिए भी बहुत सामग्री है, जो पिछले कुछ समय से सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी में जुटे हैं पर सकारात्मक परिणाम नहीं ला पास रहे हैं। कुल मिलकर 18 अध्यायों की यह छोटी मगर कारगर किताब आपकी तैयारी के नज़रिए में सकारात्मक बदलाव ला सकती है।
एक सवाल यह भी हो सकता है कि इस किताब का नाम 'मुझे बनना है UPSC टॉपर' ही क्यों रखा गया। दरअसल, यह किताब संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा की समग्र तैयारी को समर्पित है। पर किताब का यह नाम रखने का एक सहज कारण था। दरअसल जितने भी युवा अभ्यर्थी इस प्रतिष्ठित परीक्षा की तैयारी करते हैं, उनमें से ज़्यादातर के मन में श्रेष्ठ रैंक लाकर UPSC टॉपर बनने का एक सपना छिपा होता है और होना भी चाहिए। मेरे मन में भी कहीं यह ख़्वाब था कि मैं अच्छी रैंक लाऊँ। संयोग से मुझे अच्छी रैंक मिल भी गयी। पर टॉपर्स में ऐसा क्या होता है, जो उन्हें टॉपर बनाता है। मैं ऐसे ही कुछ बेहद महत्वपूर्ण पहलुओं पर ध्यान देते हुए सम्पूर्ण तैयारी का तरीक़ा साझा करना चाहता था। हालाँकि यह भी ध्यान रखें, कि टॉपर बनना या रैंक लाना या सिविल सेवक बनना ही सब कुछ नहीं है। तनावमुक्त और प्रसन्नचित्त रहते हुए एक सार्थक क्वालिटी लाइफ़ बिताना जीवन में ज़्यादा महत्वपूर्ण है और होना भी चाहिए।
यूपीएससी और राज्य लोक सेवा आयोगों की सिविल सेवा परीक्षाओं की प्रकृति कुछ ऐसी है कि इसमें समग्र दृष्टिकोण, इंटिग्रेटेड एप्रोच, लेखन कौशल, मोटिवेशन लेवल और व्यक्तित्व निर्माण के बग़ैर अंतिम रूप से सफलता मिलना बेहद मुश्किल हो जाता है। इस किताब में सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के उद्देश्य और रणनीति से लेकर ऐसे तमाम अनछुए पहलुओं को शामिल करने की कोशिश की गयी है। शायद यही बात इस किताब को सबसे अलग और विशिष्ट बनाती है।
मेरे इस प्रयास से यदि एक भी अभ्यर्थी को थोड़ा सा भी फ़ायदा हुआ या कुछ भी आत्मविश्वास बढ़ा, तो मैं ख़ुद को कृतार्थ समझूँगा। इस अपील के साथ कि हमेशा बड़ा सपना देखें, बड़ी सोच और बड़े जज़्बे के साथ, ये ध्यान रखते हुए कि मुझे अपनी लकीर बड़ी करते हुए ख़ुद को साबित करना है।
मुझे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रेरणा और साहस देने के लिए आप सब साथियों का हृदय से आभार!
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Saturday, 21 January 2017

कैसे करें वैकल्पिक विषय- हिन्दी साहित्य की तैयारी (Optional Subject- Hindi Literature for UPSC CSE)

कैसे करें वैकल्पिक विषय- हिन्दी साहित्य की तैयारी

चूँकि सिविल सेवा मुख्य परीक्षा में मेरा वैकल्पिक विषय 'हिन्दी भाषा का साहित्य' था, जिसमें मुझे सौभाग्य से 500 में से 313 अंक प्राप्त हुए थे, जो 2013 में बदले नए पैटर्न के बाद अभी तक प्राप्त जानकारी के मुताबिक़ सर्वाधिक हैं। ऐसे अभ्यर्थी, जिन्होंने सोच-विचारकर इसी विषय को मुख्य परीक्षा में चुना है, मैं उनके लिए इस विषय के बारे में कुछ विस्तार से प्रकाश डालने की कोशिश करूँगा।
क्यों चुनें -
- अंकदायी विषय
- हिन्दी माध्यम के लिए सुरक्षित विषय
- सहज, रुचिकर और आनंददायी विषय
- 3-4 माह में तैयारी संभव
- करेंट अफेयर्स से अपडेट करने की ज़रूरत नहीं 
- निश्चित और स्पष्ट पाठ्यक्रम
- लेखन कौशल का विकास।  निबंध, एथिक्स में मिल सकता है फायदा।
- विषय का बैकग्रॉउंड ज़रूरी नहीं। यद्यपि मैंने हिन्दी साहित्य में M.A., M.Phil. किया है पर अधिकांश सफल अभ्यर्थियों की पृष्ठभूमि साहित्य की नहीं होती। (एक उदाहरण- CSE 2014 में रैंक 49, पवन अग्रवाल ने इंग्लिश मीडियम से परीक्षा उत्तीर्ण की, पर वैकल्पिक विषय हिन्दी साहित्य था )
क्यों न चुनें -
- यदि हिन्दी भाषा को लिखने या पढ़ने में भी दिक्कत हो,
- विषय का दायरा व्यापक, पढ़ने को बहुत कुछ,
- भाषा-साहित्य बिल्कुल पसंद न हों।
- सामान्य अध्ययन में यह विषय मदद नहीं करता।
तैयारी कैसे करें-
हिन्दी साहित्य मेरा पसंदीदा विषय है। इसे पढ़कर मुझे अजीब सा सुकून मिलता है। सिविल सेवा परीक्षा के वैकल्पिक विषयों की सूची में भी हिन्दी साहित्य अभ्यर्थियों का एक पसंदीदा विषय है। हिंदी माध्यम के छात्रों का इस विषय की ओर सहज रुझान रहा है। इस विषय की लोकप्रियता का कारण इसका रुचिकर होने के साथ-साथ अंकदायी होना भी है। आइये, बात करते हैं हिन्दी साहित्य को वैकल्पिक विषय के रूप में लेने वालों के लिए, बेहतर प्रदर्शन के कुछ जरुरी बिन्दुओं की :
-पाठ्यक्रम में निर्धारित सभी पुस्तकों को पढ़ जरूर लें, ताकि व्याख्या करते समय सही सन्दर्भ लिख सकें।
-व्याख्या खंड में सही सन्दर्भ पहचानना बेहद ज़रूरी है। पद्य खंड में सन्दर्भ पहचानना आसान होता है और व्याख्या करना कठिन। जबकि गद्य खंड में सन्दर्भ पहचानना कठिन होता है और व्याख्या करना आसान।
 -पूरे पाठ्यक्रम को एक बार पढ़ जरूर लें ताकि सब लेखकों और उनकी निर्धारित रचनाओं  के बारे में आपको बेसिक जानकारी जरूर हो, ताकि मुश्किल वक़्त में उसका प्रयोग कर पाएं। अब नए पैटर्न में चयनात्मक अध्ययन से काम चलाना मुश्किल है। पर हाँ, हर खण्ड में कुछ अध्याय चुनकर उन्हें अधिक बेहतर ढंग से तैयार कर सकते हैं।
-चूँकि अब प्रश्नों की संख्या ज़्यादा होती है और शब्दसीमा कम, इसलिए पूरे पाठ्यक्रम की थोड़ी-थोड़ी जानकारी और समझ अवश्य रखें। हर टॉपिक को संक्षेप में तैयार कर लें।
पाठ्यक्रम- प्रश्नपत्र-1
खण्ड 'क' - हिन्दी भाषा और नागरी लिपि का इतिहास
खण्ड 'ख'- हिन्दी साहित्य का इतिहास
प्रश्नपत्र-2
खण्ड 'क'- पद्य साहित्य
खण्ड 'ख'- गद्य साहित्य
-प्रश्नपत्र-1 के खण्ड 'ख' (हिन्दी साहित्य का इतिहास) को ढंग से तैयार कर लें। यह प्रश्नपत्र-2 में भी काम आएगा। हिन्दी साहित्य का विकास किस तरह हुआ, इसे क्रमबद्ध तरीके से मोटे तौर पर समझ लें।
-विभिन्न लेखकों और कवियों के कथन और काव्य पंक्तियाँ दोनों प्रश्नपत्रों, विशेषकर द्वितीय प्रश्नपत्र में विशेष महत्त्व रखती हैं। उदाहरण देने से आपके कथन और तर्कों की पुष्टि हो जाती है। इसलिए प्रसंग के अनुरूप उदाहरण लिखने में हिचकिचाएं नहीं। पर ध्यान दें, उदाहरण प्रासंगिक और संगत लगने चाहिएं, ऊपर से थोपे हुए नहीं।
-आपने इन कोटेशन्स को जहां भी नोट किया है, (बेहतर होगा कि एक डायरी बना लें), वहां से इन्हें निरंतर दोहराते रहें। पर साथ ही हर पंक्ति के साथ उसका प्रसंग या प्रतिपाद्य जरूर लिख लें। मसलन, 'कबीर की भाषा' के बारे में लिखते हुए 'संस्किरत है कूप जल, भाखा बहता नीर' लिख सकते हैं। 'काहे री नलनी, तू कुम्हिलानी' से 'कबीर के दर्शन और रहस्यवाद' को जोड़ लें। 'किलकत कान्ह घुटरुवनि आवत', 'सूर के वात्सल्य' का अच्छा उदाहरण है। 'समन्वय उनका करे समस्त, विजयिनी मानवता हो जाय', 'कामायनी के समरसता के दर्शन' को प्रतिपादित करती हैं।  
-भाषा खंड को लेकर अभ्यर्थियों में एक अजीब सा भय रहता है। दरअसल यह खंड कम मेहनत में अधिक अंक देता है। इसकी सभी यूनिट्स को संक्षेप में तैयार कर लें। मसलन पाली, प्राकृत और अपभ्रंश में से प्रत्येक की अगर आपको 6-7 विशेषतायें पता हैं तो इतना काफी है। राजभाषा, राष्ट्रभाषा, संपर्क भाषा को ठीक से तैयार करना बेहतर विकल्प है।
-व्याकरणिक अशुद्धियों से बचने का अभ्यास।  सहज व सरल भाषा का प्रयोग। अभ्यास करना ज़रूरी, धीरे-धीरे लेखन कौशल विकसित होता जाएगा।
क्या पढ़ें और क्या नहीं-
-पाठ्यक्रम में निर्धारित सारी मूल टेक्स्ट बुक्स =,
- NCERT 11th class- साहित्य शास्त्र परिचय
- हिन्दी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास- डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी,
- हिन्दी साहित्य का इतिहास- डॉ नगेन्द्र
-हिन्दी भाषा- डॉ हरदेव बाहरी,
- छायावाद- डॉ नामवर सिंह
-कबीर- हजारी प्रसाद द्विवेदी
-कविता के नए प्रतिमान- नामवर सिंह
-हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास- डॉ रामस्वरूप चतुर्वेदी
-किसी अच्छी कोचिंग के नोट्स देख लें।
-यदि रुचि हो तो एक साहित्यिक पत्रिका जैसे 'आजकल', या 'नया ज्ञानोदय' पढ़ सकते हैं। अच्छा लगेगा और साहित्य की नवीनतम प्रवृत्तियों के प्रति भी सहज हो पाएंगे।
उत्तर कैसे लिखें-
-समग्रता और संश्लिष्टता
-क्रमबद्ध और व्यवस्थित
-कथन की पुष्टि हेतु यथासम्भव उदाहरण देना न भूलें,
- अगर पूरी कोटेशन याद न आए, तो सिंगल इनवर्टिड कोमा लगाकर आधी या चौथाई कोटेशन भी लिख सकते हैं।
-पैराग्राफ बनाकर लिखें, बुलेट पॉइंट नहीं।
- साफ-सुथरा और व्याकरणिक दृष्टि से सही लिखने की कोशिश करें।
-यदि चाहें तो महत्वपूर्ण बातों को अंडरलाइन कर सकते हैं।
रिवीजन कैसे करें - 
-रिवीजन अनिवार्य
-पाठ्यक्रम पूरा होने के बाद उसे एक-दो बार जरूर दोहरा लें,
-एक डायरी में यह नोट कर लें कि आपने पाठ्यक्रम का कौन सा हिस्सा कहां से पढ़ा है। दोहराते वक़्त काम आएगा।
-परीक्षा से एक दिन पहले दोहराने के लिए कुछ अति महत्वपूर्ण संक्षिप्त पॉइंट्स भी तैयार कर लें।
- फुर्सत में या मौका मिलने पर मूल टेक्स्ट बुक्स को यूं ही पढ़ते रहें।
-परीक्षा के पूर्व अनावश्यक विस्तार से बचते हुए पूरे पाठ्यक्रम को संक्षेप में दोहरा लें।
परीक्षा हॉल में कैसे अच्छा प्रदर्शन करें-
-
-कोशिश करें कि प्रश्नपत्र को क्रमवार हल करते चलें।  क्योंकि परीक्षक भी स्वाभाविक रूप से उसी क्रम में कॉपी जांचेंगे।
-हिन्दी के पेपर में जीएस की तरह वक़्त की उतनी कमी नहीं होती, अतः पूरा प्रश्नपत्र हल करने का प्रयास करें।
-यदि मैं अपनी बात करूँ, तो मुझे प्रथम प्रश्नपत्र में भाषा खंड और द्वितीय प्रश्नपत्र में काव्य खंड अधिक प्रिय हैं। और मैंने इन्हीं से अधिक प्रश्न हल किये थे। आप भी मन में विचार कर लें कि कौन से खण्डों से ज़्यादा प्रश्न हल करने हैं।
-हिंदी साहित्य के उत्तर पैराग्राफ में ही लिखें, बिन्दुवार नहीं।

-सहज और सरल भाषा का प्रयोग बेहतर है, पर ज़रूरत पड़ने पर साहित्यिक शब्दावली का प्रयोग करने में कतई न हिचकिचाएं।
------ निशान्त जैन